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लॉकडाउन में रुबरु हों जिले की धरोहर सेः परमार और प्रतिहार काल की वास्तुकला को बताते हैं आशापुरी के मंदिर

फोटोः07आरएसएन 08

रायसेन। आशापुरी में खुदाई के दौरान मिली थी जमींदोज मंदिरों की श्रृंखला।

रायसेन (नवदुनिया न्यूज)। परमार-प्रतिहार काल की वास्तुकला को जानने और समझने देश के एक बड़े कें द्र के रुप में 9 वर्ष पूर्व उभरे गौहरगंज तहसील के आशापुरी गांव में सदियों पहले पत्थरों पर उके रे भावों से बनी प्रतिमाएं हैं जो अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित कराती हैं। यहां 200 सालों में 26 मंदिर बने थे जिनमें 10 हजार से अधिक पत्थरों का उपयोग हुआ था। भोपाल से 35 कि लोमीटर दूर और विश्व प्रसिद्ध भोजपुर मंदिर से करीब 7 कि लोमीटर की दूरी पर स्तिथ आशापुरी गांव में तालाब कि नारे 10वीं और11वीं सदी के बने 26 से अधिक मंदिर के अवशेष मिलने के बाद सरकार के पुरातत्व विभाग ने इन्हें फिर से खड़ा करने योजना भी बनाई थी।

पुरातत्वविद डॉ नारायण व्यास बताते हैं कि हजारों साल पहले बने ये मंदिर समृद्ध वास्तुकला और भारतीय शिल्पकला के अद्भुत उदाहरण हैं। कभी यहां ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बेहद खूबसूरत मंदिर हुआ करते थे । यहा? के 26 मंदिरों के निर्माण में 10 हजार से ज्यादा पत्थरों का उपयोग हुआ है।

डॉ व्यास बताते हैं कि मंदिरों को बनाने का काम प्रतिहार काल में 9वीं से 10वीं सदी के बीच शुरु हुआ था। इसके बाद परमार काल में 10वीं सदी के मध्य से लेकर 11वीं सदी के अंत तक निर्माण कार्य लगातार लगातार चलता रहा।

इसलिए खास है आशापुरी

आशापुरी स्थित मंदिर देखने में भले ही छोटे हों, लेकि न इनको बनाने में 200 साल लगे हैं। इन ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़ी जानकारी एसपीएस भोपाल और ब्रिटेन की कार्डिफ यूनिवर्सिटी के वेल्स स्कू ल ऑफ आर्किटेक्चर की टीम के अध्ययन में सामने आई है। इन मंदिरों को बनाने का काम प्रतिहार राजाओं के काल में 9वीं से 10वीं सदी के बीच शुरु हुआ था। इसके बाद परमार काल में 10वीं सदी के मध्य से लेकर 11वीं सदी के अंत तक लगातार बनते रहे। खास बात यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में कि सी भी प्रकार के मसालों का उपयोग नहीं कि या गया, बल्कि पत्थर के ऊपर पत्थर रखकर मंदिर तैयार कि ए गए थे।

Posted By: Nai Dunia News Network

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