राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्राथमिक शिक्षक नीरज सक्सेना ने 13 वर्षों में बदल दी गांव की तस्वीर

Teachers Day 2022: अच्छे लाल वर्मा, रायसेन। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक नीरज सक्सेना ने जंगल में जीवन यापन करने वाले भीलोंं को अशिक्षा के अंधेरे से निकालकर शिक्षा के जरिए विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का काम किया है। सरकार ने मप्र के रायसेन जिला मुख्यालय से 75 किमी दूर बाड़ी ब्लाक के वन ग्राम सालेगढ़ में स्कूल भवन तो बनवा दिया था, लेकिन वहां बच्चे पढ़ने नहीं, बल्कि मवेशी चराने व शौच करने जाते थे। करीब पांच किमी क्षेत्र में झोपड़‍ियों में निवासरत भील समुदाय के लोग कच्ची शराब बनाने, वन्य प्राणियों का शिकार इत्यादि करके जीवन व्यतीत करते थे। सड़क नहीं होने के कारण बीमार होने अथवा साप्ताहिक हाट बाजार करने के लिए 15 किमी दूर कस्बा सुल्तानपुर पैदल पहुंचते थे।

ग्राम के शासकीय प्राथमिक स्कूल में 2009 में शिक्षक नीरज सक्सेना की नियुक्ति हुई। विद्यार्थी जीवन में स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित सक्सेना जैसे-तैसे पथरीले, उबड़-खाबड़ मार्ग जो कि वर्षा के मौसम में दलदल के समान हो जाता है ऐसे मार्ग से स्कूल पहुंचे।

घने जंगल व पहाड़ों के बीच दो छोटे कमरों के स्कूल भवन के चारों ओर गंदगी पसरी हुई थी। ग्रामीणों के टपरे जंगल में दूर-दूर नजर आ रहे थे। पर्वत को तोड़ कर रास्ता बनाने जैसी चुनौती देखने के बाद सक्सेना ने संकल्प लिया कि वे ग्रामीणों के साथ ही गांव की तस्वीर बदलेंगे। पहले ही दिन सूखी झाड़‍ियों की झाड़ू बनाकर जब सक्सेना स्कूल परिसर साफ करने में जुट गए तो यह दृश्य देख कर ग्राम के बच्चे व महिलाएं- पुरुष अचम्भित हो गए। शिक्षक नीरज को इस कार्य के लिए पांच सितंबर शिक्षक दिवस पर नई दिल्ली में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

शत-प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे

रायसेन में स्नातकोत्तर तक शिक्षित सक्सेना को अकेला सफाई करते देखा तो बच्चों व ग्रामीणों ने सहयोग करना शुरू कर दिया। दूसरी अच्छी बात यह हुई कि ग्रामीणों ने स्कूल परिसर के पास मवेशी चराना व शौच करना बंद कर दिया। बाद में सक्सेना ने स्कूल परिसर में स्वयं के खर्च से तार फेंसिंग कराई व पौधारोपण कर दिया। उस समय करीब बीस बच्चे स्कूल आते थे। ग्रामीणों ने नियमित रूप से बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। साल दर साल स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने लगी। वर्तमान में ग्राम के शत-प्रतिशत 113 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

खेल- खेल में शिक्षा दी

सक्सेना बताते हैं कि बच्चों में भूलने की आदत थी। जो भी पढ़ाते तो बच्चे भूल जाते थे। तब उन्होंने खेल-खेल में शिक्षा का प्रयोग किया। पूरे स्कूल परिसर में जो पौधे लगाए गए थे उनमें तख्तियां टांग दीं। बच्चे खेलते हुए तख्तियों से पढ़ना सीख गए। अब बच्चों को महापुरुषों, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व प्रमुख पदों पर आसीन लोगों से लेकर जिले के कलेक्टर व जिला शिक्षाधिकारी तक के नाम याद हो गए हैं।

भील समुदाय के जीवन में बदलाव

शिक्षा की अलख जगने के साथ ही यहां के भील आदिवासी समुदाय के लोगों के जीवन में भी बदलाव आया है। सक्सेना ने स्कूल में बच्चों को जब आदर्श जीवन पद्धति बताई तो बच्चों ने अपने-अपने घरों में जाकर अभिभावकों को बदलाव के लिए मजबूर कर दिया। ग्रामीणों ने कच्ची शराब बनाना व वन्य प्राणियों के शिकार करना छोड़कर खेतीबाड़ी करने व सब्जी- फल, दूध बेचने का धंधा अपना लिया है। जंगल पर आश्रित जीवन छोड़कर अब यहां के भी भील समुदाय के लोग राष्ट्रीय विकास की मुख्य धारा से जुड़ गए हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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