प्रदीप जैन, सारंगपुर। अनेक में एकता वाले हमारे देश में परंपरा और संस्कृति, बोली और रहन सहन कदम कदम पर बदल जाते है और एक ही त्योहार कई तरह से मनाए जाते है। नवरात्र के बाद दसवें दिन मनाए जाने वाले विजयादशमी पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए रावण के पुतले को जलाया जाता है और राम नाम के जयकारे लगाए जाते हैं। लेकिन हाईवे क्रमांक 52 के किनारे एक ऐसा गांव है, जहां रावण का पुतला दहन करने की बजाए रावण को भगवान के रूप में पूजा जाता है। भाटखेडी गांव में हाईवे के किनारे पर लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी रावण और कुंभकरण की मूर्तियां मौजूद हैं। जिनकी पूजा गांव के लोग अपने इष्ट देव के रूप में करते हैं। यहां पर मान्यता है कि इनकी पूजा करने से गांव पर कभी भी विपत्ति नहीं आती है और हमेशा गांव में खुशहाली बनी रहती है।

दशहरे पर रावण और कुंभकरण का नहीं होता दहन

पूरे क्षेत्र में दशहरे के दिन रावण के साथ कुंभरण और मेघनाथ का दहन किया जाता है, लेकिन भाटखेडी गांव में रावण और कुंभकरण की पूजा की जाती है। भाटखेडी गांव के नेशनल हाईवे 52 आगरा मुंबई के नजदीक एक खेत में रावण और कुंभकरण की मूर्तियां स्थापित हैं। और यहां के लोग बताते हैं कि यह मूर्तियां लगभग डेढ सौ साल से भी अधिक पुरानी हैं, और उनके पूर्वजों के द्वारा यह स्थापित की गई थी। रहवासी जगदीश, सुरेश आदि बताते हैं कि जब भी गांव पर कोई मुसीबत आती थी, तो वह अपनी मुसीबत लेकर देवता रावण के समक्ष आते थे और उनकी मुसीबत का हल निकल आता था।

होती है पूजाः ग्रामीणों का कहना है कि हम रावण और कुंभकरण को राक्षस नहीं मानते हैं, बल्कि वह हमारे लिए इष्ट देवता हैं, वे बताते हैं कि यहां पर लोग दूर दूर से अपनी मुरादों को लेकर आते हैं और उनकी मुराद भी पूरी होती है। वहीं जब भी गांव में विपदा होती है, या बारिश के मौसम में सूखे जैसी स्थिति दिखाई देती है, तो गांव के व्यक्ति यहां पर इकट्ठा होते हैं और देवता रावण से प्रार्थना करते हैं कि उनके गांव में जल्द से जल्द बारिश हो। जिस दिन पूजा की जाती है उसी दिन बारिश भी शुरू हो जाती है। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि इंदौर के रहने वाले एक व्यक्ति के घर में संतान नहीं हो रही थी। उन्होंने यहां आकर मन्नात मांगी और उनकी मनोकामना पूरी हो गई। जिसके बाद वह हर साल नवरात्र में इन दोनों मूर्तियों की पूजा करने के लिए आते हैं। भाटखेडी गांव में रावण को देवता के रूप में पूजा जाता है। जिसके वजह से यहां पर भी रावण का दहन नहीं किया जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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