रतलाम का मन सौहार्द्र के ग्रंथ का पर्याय है। इस ग्रंथ में सदभाव की स्याही से लिखे हुए आत्मीयता के अक्षर और अपनत्व के अध्याय हैं। रतलाम का मन शैशव की किलकारियों से कोयल सा कुहकता है, किशोरवय के सपनों में चंद्र सा चमकता है, तरुणाई के तेवरों में दिनमान सा दमकता है, बुजुर्गों के अनुभवों में बगीचे सा लहकता है। रतलाम का मन अदब के आशियाने तामीर करता है, साहित्य की सुराही में सरोकारों का नीर भरता है।

रतलाम का मन मजदूर के पेशानी के पसीने को पढ़ता है, किसानों के अधिकार और हित के लिए लड़ता है। रतलाम का मन कभी समाजसेवक तो कभी मीडिया के रूप में जनसमस्याओं को समाधान हेतु शासन तक ठेलता है, कभी रचनाकर्मी-रंगकर्मी की तरह हल हेतु नुक्कड़ नाटक खेलता है। रतलाम का मन, राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर उल्लास का उजास हो जाता है, आपदा के समय सेवा और सहयोग का सुवास हो जाता है। रतलाम के मन की मुंडेर पर चेतना और चिंतन के चिराग जलते हैं, जिनकी रोशनी में मुश्किलों के हल निकलते हैं।

यह तो हुई रतलाम के मन की बात। अब करते हैं रतलाम के जन के स्वभाव से मुलाकात। रतलाम के जन अर्थात लोग सामान्यतः स्वभाव से सरल हैं। इसी कारण व्यवसाय और व्यापार में सफल हैं। रतलाम के लोग महत्वाकांशी हैं, इसलिए प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़़ते हैं, किंतु बल और छल से किसी की टांग खींचकर शिखर पर नहीं चढ़ते हैं। रतलाम के लोग सुख-दुख में साझेदारी करते हैं, रिश्ते निभाते हैं और व्यर्थ की बातों पर ध्यान नहीं धरते हैं।

और अब आते हैं उस बिंदु पर कि कैसी है रतलाम की आब-ओ-हवा। तो समझ लीजिए कि ये है हर मर्ज की दवा। रतलाम का मौसम बाहर से आने वालों को ऐसा भाता है, कि जो भी आता है यहीं बस जाता है। ये बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। केवल भावनाओं में नहीं बह रहा हूं। जी हां! इन पंक्तियों का लेखक अर्थात अजहर हाशमी, राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिड़ावा देहात से चलकर लोहे की पेटी में कुछ कपड़े, एमए राजनीति विज्ञान की डिग्री और मप्र शासन का व्याख्याता के पद पर नियुक्ति का पत्र लेकर 06 सितंबर 1974 को देहाती की तरह रतलाम कालेज में आया और रतलाम की जनता, विद्यार्थियों तथा मीडिया ने इस देहाती अजहर हाशमी को दिल्ली और फिर दुनिया के कई देशों तक साहित्य में पहुंचा दिया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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