Ratlam News: रतलाम (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरिजी ने हनुमंत धाम (विधायक सभागृह) में सैकड़ों गुरु भक्तों को मंत्र दीक्षा प्रदान की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में सोलह संस्कार हैं और उनमें मंत्र दीक्षा का संस्कार सबसे उत्तम है। यह संस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति का नया जन्म होता है। उसका गुरु-शिष्य के रूप में एक संबंध भी जुड़ जाता है।

प्रभु प्रेमी संघ के तत्वावधान में आयोजित मंत्र दीक्षा कार्यक्रम में आरंभ में आचार्यश्री ने उपस्थित भक्तों को सभी संस्कारों की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति कालजयी है। अन्य देशों की संस्कृतियां पैदा हुईं और खो गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति शाश्वत है।

उन्‍होंने कहा कि भारतीय प्रकृति से, वनस्पितयों से, जल से, नभ से, सब से प्रेम करते हैं। हमारा धर्म सनातन है। हमारी संस्कृति में धरती को माता माना गया है। गाय भी माता का स्वरूप है और मातापिता को देव कहा गया है। गुरुशिष्य का संबंध अटूट होता है। गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने वाला कभी असफल नहीं होता। स्वामीजी ने संबोधन के बाद उपस्थित भक्तों को मंत्र दीक्षा प्रदान की। इससे बाद हनुमंत धाम में आए अन्य भक्तों से भी मुलाकात कर उन्हें शुभाशीष प्रदान किया।

इंदौर प्रस्थान से पूर्व एकता का संदेश

स्वामीजी ने रतलाम से दोपहर में इंदौर प्रस्थान किया। इसके पूर्व दयाल वाटिका में प्रभु प्रेमी संघ व समन्वय परिवार सदस्यों से संयुक्त चर्चा की। उन्होंने एकजुटता को और मजबूत कर समाजसेवा के कार्यों को बढ़ाने का आह्वान किया। स्वामीजी से इस दौरान रतलाम सहित आसपास के विभिन्ना स्थानों से आए भक्तों ने आशीर्वाद लिया।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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