अनिल त्रिवेदी, इंदौर। 16 साल के मृत्युंजय जोशी ने सातवीं कक्षा के बाद स्कूलिंग छोड़ दी है। अब वह इंटरनेट, वीडियो और पत्राचार के माध्यम से संस्कृत सीख रहा है। इसी तरह 14 साल की वैदेही व्यास 'सिया" ने भी पांचवीं के बाद स्कूल से तौबा कर ली है।

ये दोनों संस्कृत में इतने निष्णांत हो गए हैं कि अब कार्यशालाओं में संस्कृत सिखा रहे हैं। कविताओं और कहानियों के साथ-साथ संस्कृत में नाटक भी लिख रहे हैं और उनका मंचन भी कर रहे हैं। सात साल के आर्जव तिवारी ने पहली कक्षा के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया है।

वह घर पर ही माता-पिता से संस्कृत, हिंदी के अलावा अंग्रेजी और गणित सीख रहा है। पेशे से मनोविश्लेषक पिता मयंक तिवारी कहते हैं कि करीब 11 साल की प्रैक्टिस के दौरान मेरे पास ऐसे कई बच्चों के अभिभावक आए जिनका कहना है कि अतिव्यस्तता के चलते बच्चे की स्वाभाविक गतिविधियां और बढ़त प्रभावित हो रही है, इसलिए मैं आर्जव को पूरी तरह से उसके नैसर्गिक स्वभाव के मुताबिक संस्कारित होने का अवसर दे रहा हूं, ताकि वह नंबरों की होड़ में उलझने के बजाय अपनी अलग लकीर खींचने की कोशिश करे।

वैज्ञानिक भाषा है संस्कृत

मृत्युंजय की मां शर्वाणी कहती हैं कि वे दिन हवा हो गए जब किसी बच्चे की प्रतिभा का आकलन उसकी वास्तविक योग्यता के बजाय डिग्री के आधार पर किया जाता था। फिर भी अगर मृत्युंजय को आगे की पढ़ाई करनी होगी तो वह मानव संसाधन मंत्रालय के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) के जरिए ऐसा कर सकता है।

सान्वी (12 साल) और पार्थ (10 साल) की मां चेरी कपाले बताती हैं कि उनकी दोनों बच्चियों ने भी करीब दो साल से स्कूल छोड़ दिया है। अब वे संस्कृत और वैदिक मैथ्स सीख रही हैं। मार्क्स बेस्ड सिस्टम के तनाव से बच्चियों को बचाने और उनके समय का सदुपयोग कराने के लिए हमने उनकी स्कूलिंग छुड़वाई है। संस्कृत सिखाने की वजह है कि यह पूरी तरह वैज्ञानिक भाषा है।

संस्कृत में निहित संस्कृति का मूल: योगसूत्र के करीब 195 श्लोक कंठस्थ कर अब गीता के सभी श्लोक कंठस्थ कर रही वैदेही के पिता संदेश व्यास के अनुसार भारतीय संस्कृति का मूल संस्कृत में निहित है। अगर हम वास्तव में बच्चों को सद्विचारों और भारतीय संस्कारों से जोड़ना चाहते हैं तो उन्हें देवभाषा संस्कृत जरूर पढ़ाएं। साढ़े आठ साल की जयंती और 10 साल की रुक्मिणी भी संस्कृत सीख रही हैं।

रक्षाबंधन के दिन मनाते हैं 'संस्कृत दिवस

भारत में हर साल श्रावणी पूर्णिमा अर्थात 'रक्षाबंधन" को ही 'संस्कृत दिवस" मनाया जाता है। 1969 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश जारी किया गया था।

इस दिन को इसीलिए चुना गया था क्योंकि प्राचीन समय में भारत में इसी दिन नया शिक्षण सत्र शुरू होता था। वर्तमान में संस्कृत दिवस देश के बाहर भी कई जगहों पर मनाया जाता है। जिस सप्ताह संस्कृत दिवस आता है, उसे 'संस्कृत सप्ताह" के रूप में मनाया जाता है। संस्कृत दिवस एवं संस्कृत सप्ताह मनाने का मूल उद्देश्य संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार कर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है।