नीलांबुज पांडे

रीवा नईदुनिया प्रतिनिधि।

रीवा में एक चाय वाला महापौर बनने के लिए चुनाव मैदान में है। यह चाय वाला पिछले 20 सालों से चाय का ठेला लगाकर गुजर बसर कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह अपना आदर्श मानता है।

शहर के एक नुक्कड़ में चाय बेच रहे ये है शुक्ला जी। ये 20 वर्षो से टी स्टाल चलाकर जनता की सेवा कर रहे है। नगरीय निकाय चुनाव के दंगल में शुक्ला भी मैदान में है। ये नगर का प्रथम महापौर बनाने की चाहत रखते है। इसीलिए रामचरण नगर पालिक निगम रीवा में महापौर की दावेदारी ठोंक कर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए है। रामचरण शुक्ला पिछले 20 वर्षो से चाय का ठेला लगा रहे है। वह शुक्ला टी स्टाल वाले के नाम से चर्चित है। प्रतिदिन सुबह वह अपने टी स्टाल पर आते है और चाय बनकर लोगो को पिलाते है। यहां आने वाले परेशान लोगो की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास भी करते है। उनकी दलील है की जब चाय वाला प्रधानमंत्री बन कर देश चला सकता है तो मै महापौर बनाकर नगर क्यों नहीं चला सकता। शुक्ल जी बताते है कि पीएम नरेन्द्र मोदी और उनमें समानता है वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सदस्य थे और मैं भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक हूं। वह एक गरीब परिवार से है इसलिए उन्हें जनता का दुख दर्द पता है। नगर में मूलभूत समस्याएं है जिन्हें वह दूर कर सकते है. रामचरण कहते है अगर जनता उन्हें महापौर चुनती है तो वह ऑफिस में नहीं बैठेंगे बल्कि गली में घूम घूम समस्याएं देखेंगे। रेहड़ी ठेला और गुमटी वालो की समस्याओं का निराकरण करेंगे। केवल उन्हें एक वाहन चाहिए जिससे वह घूम सके। रामचरण चाय बेचने के साथ ही वह ग्राहकों से वोट देने की अपील कर रहे है।

बालेंद्र तिवारी स्थानीय बताते हैं कि शुक्ला टी स्टाल में आने वाले ग्राहक भी उनके पक्ष में है। लोग बताते है की शुक्ला जी चाय बेचने के साथ ही समाज सेवा करते रहते है। बारह महीने वह लोगों को पानी पिलाते है. भूखो को खाना खिलते है और जितना उनसे बन पड़ता है लोगो की समस्याएं हल करते है। इन्हे जनता ने मैदान में उतारा है, रोगों का कहना है की जब पीएम चाय बेच सकते है तो शुक्ला जी भी चाय बेचकर महापौर बन सकते है।

रीवा का पहला महापौर चुना गया था चौकीदार : लगभग तीन लाख मतदाताओं वाले शहर में नगरीय निकाय चुनाव में महापौर पद के 14 प्रत्याशी मैदान में है। 1994 पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद पहला महापौर अमीरुल्लाह खान बने। जो की चौकीदार थे, उस दौर में निर्वाचित पार्षद महापौर चुनते थे। लेकिन अब वक्त बदल गया है। महापौर जनता चुनती है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा की चाय वाले शुक्ला जी कितना प्रभाव छोड़ते है।

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