बीना (नवदुनिया न्यूज)। जो व्यक्ति अपने मन को वश में करने की कला से पारंगत हो जाता है उसका कल्याण हो जाता है। सिर्फ उसे मन को वश में करना है, मोह में नहीं बहकने देना है। ज्ञानी संयोग, वियोग में और सुख-दुख में भी संतोष व प्रसन्ना रहकर धर्मामृत का पान करते हैं। लेकिन अज्ञानी मोह से ग्रसित मन को नियंत्रित नहीं कर पाता, जिससे शोक और संतप्त हो उठता है। यह बात श्रुतधाम में क्षमावाणी पर्व की पूर्व संध्या पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए ब्रह्राचारी संदीप भैया सरल ने कही।

आगे उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं मेरा पुत्र, मेरी बहू, मेरी पत्नी, ऐसा है, वैसा है। मुझे दुख देता है। वह दूसरे के दुर्गुण को तो देखता है पर अपने पाप कर्मों के उदय को और दुर्गुणों को नहीं देखता। इस प्रकार चंचल मन वाला जीव, धर्मरूपी अमृत पान के बजाय दुख में लीन हो जाता है। भैया जी ने कहा कि हम किसी मंत्र का जाप करते हैं तभी मन ज्यादा मचलता है। मन में अनेक विचार आते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि मंत्र जाप हमारी आदत बन गया है और मंत्र जाप जब आदत बन जाता है तो मन को खुलकर खेलने का अवसर मिल जाता है। मंत्र चल रहा होता है और मन में घर का विचार आता है। दुकान का हिसाब भी लगा लेते है। बगल में कोई बात कर रहा है, वह भी सुन लेते हे। इधर हाथ की माला के मोती सरकते हैं उधर मन भी सरक जाता है। माला के मनके एक-एक करके यंत्रवत सरक रहे हैं। टेप रिकार्डर की तरह जिनका भी मंत्र का उच्चारण कर रही है, लेकिन मन मंत्र में रहने के बजाए अन्यत्र घूमता है। यह मंत्र जाप नहीं, बल्कि मंत्र जाप का अभिनय है। आगे उन्होंने कहा कि जब मंत्र जाप करने बैठे तो मंत्र जरा बदलकर बोलें। मंत्र तो वहीं बोलें मगर नीचे से ऊपर की ओर बढ़ें, फिर देखना मंत्र जाप में मन कैसे नहीं लगता। पूरे होश में मंत्र जाप करना होगा, क्योंकि जरा भी होश चूके कि मंत्र सीधा शुरू हो जाएगा। उल्टा मंत्र जाप से मन निष्चित ही एकाग्र होगा।

जाप के दौरान मन शुद्ध रहना चाहिए

भैया जी ने कहा कि इतना ख्याल रखें कि मंत्र आदत न बन जाए। महत्वपूर्ण मंत्र नहीं, मन की एकाग्रता है। एक बार मंत्र अशुद्ध हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन मन अशुद्ध नहीं होना चाहिए। मन की शुद्धि ही मंत्र की सिद्धि में कारण होती है। मंत्र जाप का फल या उपलब्धि नहीं दिखे तो मंत्र को दोष नहीं, मन को दोष देना। माला तो केवल साधन है, मुख्य तो मन है, जो जाप के समय भी किसी न किसी पाप में उलझा रहता है। पापी मन परमात्मा से साक्षात्कार कैर कर सकता है। इसलिए जाप से अधिक महत्वपूर्ण है, मन की एकाग्रता।

क्षमावाणी पर्व आज

अनेकांत ज्ञान मंदिर के तत्वाधान एवं ब्रह्राचीर संदीप भैया सरल के सानिध्य में आज 1008 भगवान आदिप्रभु का महामस्तिकाभिषेक एवं क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा। अशोक शाकाहार ने बताया कि रविवार को सुबह 7ः15 बजे अभिषेक शांतिधारा संपन्ना होगी। इसके बाद भगवान आदिनाथ का महामस्तिकाभिषेक संपन्ना होगा। सुबह 9 बजे ब्रह्राचारी संदीप भैया क्षमावाणी पर्व पर विशेष प्रवचन देंगे। इसके उपरांत10 बजे सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वाधान में क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा।

Posted By: Nai Dunia News Network

NaiDunia Local
NaiDunia Local