सागर (नवदुनिया प्रतिनिधि)। श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर नेहानगर में विराजमान संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर के शिष्य मुनिश्री कुंथुसागर महाराज ने कहा कि आज प्रत्येक व्यक्ति धन और अधिकार की बात करता है, लेकिन धर्म और कर्तव्य की बात करना नहीं चाहता। जो व्यक्ति धर्म और कर्तव्य को छोड़ कर के धन और अधिकार की बात करता है उसे जीवन में कभी सुख शांति नहीं मिलती, क्योंकि धन और अधिकार धर्म और कर्तव्य से ही प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि हम धर्म और कर्तव्य को छोड़ कर के धन और अधिकार पाना चाहे यह संभव नहीं है। अन्याय पूर्वक यदि आप धन और अधिकार पा लेंगे तो सुखी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि अधिकार तो तभी होता है जब सामने वाला आपको स्वीकार करता है एवं तभी स्वीकारेगा जब आप धार्मिक होंगे जब आप कर्तव्य का पालन कर रहे होंगे इसलिए धर्म और कर्तव्य का पालन करिएगा। कर्तव्य क्या वस्तु है बंधुओं इस शब्द का अर्थ सीधा सा है जियो और जीने दो। भगवान महावीर ने सबसे पहला कर्तव्य ही बताया है हम स्वयं जिये और दूसरे को जीने दे एयही हमारा परम कर्तव्य है इसी को हम परम धर्म कह सकते हैं।

हर एक प्राणी जीना चाहता है

उन्होंने कहा कि हर एक प्राणी जीना चाहता है और सामने वाले के अधिकार को छीनना चाहता है। यह नहीं समझता कि जैसा अधिकार आपको है वैसा ही अधिकार प्रत्येक प्राणी को भी है। उनके अधिकारों की हत्या ना करें उनके अधिकारों का हनन ना करें यह भी हमारा कर्तव्य है। स्वयं सुख से जिये दूसरे को भी जीने दे इसी का नाम कर्तव्य है या यूं कहा जाए इसी का नाम धर्म है। कर्तव्य और धर्म में एक से यदि हम कर्तव्य को धर्म कह दे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि व्यवहार में कर्तव्य को ही धर्म कहा जाता है कर्म को ही पूजा कहा जाता है। कर्तव्य ही पूजा है ऐसा कहा जाता है अर्थात जो व्यक्ति अपने कर्तव्य में लगा हुआ है वह भगवान की पूजन कर रहा है।

जो कर्तव्यनिष्ठ है निश्चित रूप से वह धर्मात्मा है

उन्होंने कहा कि जो कर्तव्यनिष्ठ है निश्चित रूप से वह धर्मात्मा है, क्योंकि कर्तव्य से दूर कहीं व्यवहारिक धर्म नहीं होता। सबसे पहला कर्तव्य है हमें अपने आप को सुधारना जो व्यक्ति अपने आपको नहीं सुधार सकता वह दुनिया को सुधारने का काम ना करें और उसकी कामना भी ना करें, क्योंकि स्वयं को सुधारना हमारा परम कर्तव्य हुआ करता है। यदि हम देश को सुधारना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने आप को सुधारिएगा। यदि आप अपने आप को सुधार लेते हैं तो निश्चित ही देश में एक व्यक्ति सुधर जाएगा यही आपका देश के लिए योगदान हो जाएगा। यह भी आपका देश के प्रति कर्तव्य हो जाएगा इसलिए हमारा कर्तव्य है कि सबसे पहले हमे अपने आप को सुधारने की आवश्यकता है। पहला कदम अपने आप से प्रारंभ करिएगा यह एक कर्तव्य है कि हम एक नेक इंसान की जिंदगी जिए।

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