-सिद्धचक्र महामंडल विधान संपन्न, मुनि संघ की हुई अगवानी

- मुनि अभयसागर जी ने धर्मसभा को किया संबोधित

बीना(नवदुनिया न्यूज)।

सनाई में चल रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान का रविवार को समापन हुआ। गांव में शोभायात्रा निकाली गई। विधान में शामिल हुए इंद्र-इंद्राणियों के साथ धर्मध्वजा लिए नौनिहाल चले। इसके पहले पठारी से मुनि अभयसागर व अन्य की अगवानी हुई। जैन समाज ने उनका स्वागत किया गया।

सिद्धचक्र महामंडल विधान में इंद्र-इंद्राणियों ने मंत्रोच्चार के साथ विश्व की शांति के लिए अर्घ्य समर्पित किए। मुनि अभयसागर, मुनि प्रभातसागर, मुनि निरीहसागर महाराज के सानिध्य में पूर्ण आहूति व हवन किया गया। हवन के बाद भगवान चंद्रप्रभु का महामस्तिकाभिषेक संपन्ना हुआ। श्रीजी की भव्य शोभायात्रा चंद्रप्रभ जिनालय से शुरू हुई। जो मुख्य मार्गों से होती हुई वापस कार्यक्रम स्थल पहुंची। आगे घोड़े पर सवार धर्म ध्वजा लिए नौनिहाल चल रहे थे। पीछे विभिन्ना स्थानों से आए नवयुवक मंडल, महिला मंडल अपनी भजन मंडलियों व वाद्ययंत्रों के साथ मनोरम प्रस्तुति दे रहे थे। शोभायात्रा के मध्य में श्रीजी के विमान को श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाए चंवर डुला रहे थे। जगह-जगह चैक पूरकर यात्रा का स्वागत किया गया। यात्रा का समापन कार्यक्रम स्थल चंद्रप्रभ जिनालय के समीप बने विशाल परिसर में हुआ।

मोह-माया के चक्र से निकलने का करें प्रयास

सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन अवसर पर मुनि अभयसागर ने कहा कि सांसारिकता का मोह ही कुछ ऐसा है कि अज्ञानी जीव इससे बाहर निकलने से कतराता है। उसकी स्थिति तेल निकालने के घाणी के बैल की तरह होती है या घड़ी के कांटें जैसी होती है, जो चैबीस घंटे गोल चक्र में घूमता हैए मगर उस चक्र से बाहर नहीं निकल पाता। सांसारिकता के चक्कर में फंसा मानव नित्य स्वाध्याय करता है, महापुरुषों के उपदेश सुनता है, लेकिन जीवन में कुछ भी परिवर्तन नहीं ला पाता। चक्र से बाहर निकलने का उपाय नहीं करता।

मुनिश्री ने कहा कि जरा विचार करें, हम अपने बच्चे को टॉफी, बिस्किट आदि का लालच देकर स्कूल भेजते हैं। इसका यही तो उद्देश्य होता है कि बच्चा पढ़ना सीखे। एक दो वर्ष बाद भी यदि बच्चा कुछ नहीं सीख पाया, तो हम न केवल बच्चे को दोष देंगे, बल्कि स्कूल के शिक्षकों को भी भला बुरा कहने से नहीं चूकेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चा घड़ी की सुइयों की भांति स्कूल व घर के चक्कर तो लगाता है, किन्तु आगे नहीं बढ़ पाता। यही स्थिति अपनी भी है प्रवचन स्थल में अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं। संत एवं महापुरुषों के प्रवचन भी रूचि से सुनते हैं। अपना यह क्रम वर्षों से चल रहा है, लेकिन जीवन में जो परिवर्तन आना चाहिए, वह नहीं आ पाता...ऐसा क्यों? यह चिन्तन का विषय है।

1602एसए141. विधान के समापन पर झूमते श्रद्धालुजन।

Posted By: Nai Dunia News Network