सागर के कार्तिकेय ने आईआईटी गुवाहाटी में 4 साल में 1000 से अधिक कम्पाउंड्स पर शोध कर कालाजार रोग के दो पैरासाइट को खोजा

- 'बॉयोटिंग सल्फोन' और 'कैंपफेरोल' कम्पाउंड्स से कमजोर होगा कालाजार का परजीवी

- कालाजार पर रिसर्च के बाद कार्तिकेय तिवारी को पीएचडी हुई अवार्ड, इसी रोग पर आगे भी करेंगे रिसर्च।

अतुल तिवारी सागर। नवदुनिया प्रतिनिधि

चार साल की रिसर्च के बाद सागर निवासी आईआईटी गुवाहाटी के छात्र डॉ. कार्तिकेय तिवारी ने कालाजार रोग के नए पैरासाइट की खोज की है। शहर के श्रीरामनगर में रहने वाले कार्तिकेय ने 2012 में आईआईटी गुवाहाटी की 'लैब ऑफ प्रोटीन बॉयोकैमिस्ट्री एंड बॉयोकैमिकल' में इस रोग पर रिसर्च शुरू की और करीब एक हजार से अधिक कम्पाउंड्स पर शोध कर कालाजार के दो नए पैरासाइट की खोज करने में कामयाब हुए। ये दो नए पैरासाइट 'बॉयोटिंग सल्फोन' और 'कैंपफेरोल' हैं। इन दोनों पैरासाइट की मदद से कालाजार के परजीवी 'लिसमानिया' के एन्जाइम 'डाइहैड्रोरोऑरटेस' को आसानी से इन-एक्टिव किया जा सकता है। इसके बाद इस परजीवी का शरीर पर कोई असर नहीं पड़ता और रोग की रोकथाम आसानी से की जा सकती है।

कालाजार रोग फैलने का कारण

कालाजार रोग को भारत में काला ज्वर के नाम से भी जाना जाता है, इस रोग में बुखार, वजन घटना, थकान, एनीमिया और लीवर व प्लीहा में सूजन आ जाती है। यह रोग फ्लेबोटोमिन सैंड फ्लाई नाम की एक छोटी मादा मक्खी के काटने से फैलता है। सैंड फ्लाई अपने अंडों के विकास के लिए जानवरों और मनुष्यों को काटती है और लीशमैनिया परजीवी को शरीर में फैला देती है।

एक हजार से अधिक कंपाउंड्स पर किया प्रयोग

नवदुनिया से बातचीत में डॉ. कार्तिकेय तिवारी ने बताया कि उन्होंने 2011 में आईआईटी में एडमिशन लिया था। इसके बाद 2012 में उन्हें रिसर्च के लिये यह टॉपिक मिला। उन्होंने प्रोफेसर विकास दुबे के निर्देशन में शोध कार्य शुरू किया और कालाजार के परजीवी को निष्क्रिय करने के लिए पहले कुछ चुनिंदा कंपाउंड्स का प्रयोग किया, लेकिन जब इन कंपाउंड्स का परजीवी पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने एक-एक कर सभी कम्पाउंड्स का परजीवी पर प्रयोग करना शुरू कर दिया। एक हजार से अधिक कम्पाउंड्स का लैब में प्रयोग करने के बाद इन दो पैरासाइट की खोज हुई है। इस रिसर्च के बाद तैयार थीसिस विदेश में एक्सटर्नल के पास चैक होने जाती है। वहां से शोध सही पाए जाने पर कार्तिकेय तिवारी को आईआईटी गुवाहाटी से पीएचडी अवार्ड हुई है।

कालाजार रोग के लक्षण

- इस रोग में बुखार, वजन घटना, थकान, एनीमिया और लीवर व प्लीहा में सूजन आ जाती है। यह रोग दो लाख से चार लाख संक्रमणों के लिए जिम्मेदार है।

- बुखार का रुक-रुक कर आना, भूख में कमी, लगातार वजन कम होना, दुर्बलता।

- त्वचा शुष्क, पतली स्केल जैसी हो जाती है। त्वचा के बाल कम हो सकते है। पैर, पेट और चेहरे की त्वचा पर भूरे रंग के विकर्ण देखते हैं। इस वजह से इसे ब्लैक फीवर या कालाजार कहते है।

- काला अजार या काला ज्वर लीशमैनियासिस का सबसे गंभीर रूप है। समय पर उचित निदान व उपचार न मिलने पर यह रोग मृत्यु की संभावना को बढ़ा देता है।

डब्ल्यूएचओ भी जता चुका है चिंता

कालाजार रोग को विश्व स्वास्थ्य संगठन भी चिंता का विषय मान चुका है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार कालाजार के सह-संक्रमण की उभरती समस्या एक विशेष चिंता का विषय है। भारत में पूर्वी राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह बीमारी स्थानिक है।

सागर से प्राप्त की स्कूली शिक्षा

डॉ. कार्तिकेय तिवारी के पिता डॉ. भुवनेश्वर तिवारी ने बताया कि कार्तिकेय ने स्कूली शिक्षा शहर के वात्सल्य स्कूल से पूर्ण की है। इसके बाद कार्तिकेय ने जेपी इंस्टीट्यूट नोएडा से बॉयोटेक्नोलॉजी में बीटेक किया और फिर भोपाल आरजीपीवी से एमटेक किया। इसके बाद 2011 में उन्होंने आईआईटी गुवाहाटी में एडमिशन लिया। डॉ. कार्तिकेय ने बताया कि यह उनके रिसर्च का एक पार्ट मात्र है। वर्तमान में कालाजार रोग के लिये बाजार में हाई डोज की दवाइयां मौजूद हैं। इसलिए आगे वे कालाजार रोग पर और गहन रिसर्च करने वाले हैं।

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फोटो 2502 एसए 1 - डॉ. कार्तिकेय तिवारी।

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