- पीएचई विभाग पर लगाया अनदेखी व अदूरदर्शिता का आरोप

देवरीकलां। नवदुनिया न्यूज

देवरी व केसली ब्लॉक में जलसंकट की समस्या विकराल हो गई है। कई जगह नल-जल योजनाएं ठप पड़ी हैं। कुएं, हैंडपंप सहित अन्य जलस्रोतों में भी इतना पानी नहीं है, जिससे लोगों की प्यास बुझ सके। लोगों का कहना है कि नल-जल योजनाएं के संचालन को लेकर पीएचई विभाग की आदूरदर्शिता के चलते हालात खराब हुए हैं। कई ठेकेदारों द्वारा निर्धारित समय सीमा में काम नहीं किया। गांव-गांव में हैंडपंप लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, कुआं का पानी पूरी तरह से सूख चुका है। ऐसे में लोग आसमान की ओर निहार रहे कि कब मानसून की बारिश हो जाएं और पीने के पानी की समस्या से निजात मिल जाए। जानकारी के मुताबिक पेयजल की भयंकर स्थिति के बाद भी देवरी सब डिविजन में पदस्थ एसडीओ प्रांजलि राय विभागीय कामकाज ठीक तरह से संचालित नहीं कर रही हैं। लोग पानी को परेशान हैं। वहीं एसडीओ शासकीय अवकाश लेकर चली गई हैं। विभाग में पदस्थ उपयंत्री कभी फील्ड पर नहीं जाते हैं। इससे नल-जल योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं।

ग्राम पंचायत का कांसखेड़ा ग्राम पंचायत के छीर गांव में स्वीकृत नल-जल योजना लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। ठेकेदार द्वारा पानी की टंकी पीएचई ऑफिस के सामने बना दी गई है, लेकिन टंकी के पास पेय जलस्रोत अभी तक नहीं है। जहां पर जलस्रोत बनाया गया है, उसका उपयोग भी नहीं हो पा रहा है। छीर गांव में अधिकांश जगह पाइप लाइन बिछा दी गई है। इस में भी ठेकेदार द्वारा नियमों का ध्यान नहीं रखा गया है। इस भीषण गर्मी में ठेकेदार द्वारा पानी की टंकी का निर्माण कार्य पूरा नहीं किया गया। इससे मुख्यमंत्री नल-जल योजना का लाभ सभी ग्राम पंचायत के बाशिंदों को नहीं मिल पाया। यही हाल सिलारी गांव का है। यहां के बाशिंदे दिन और रात पीने के पानी के लिए दो 2 किमी तक का सफर तय कर रहे हैं। ग्राम पंचायत रीछई में 5 साल बाद भी नल-जल योजना आरंभ नहीं हो पा रही है। जबकि हर साल इस योजना पर लाखों रुपए खर्च किया जा रहा है। पीएचई विभाग और ग्राम पंचायत की लापरवाही सामने आने के बाद भी जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। ग्राम पंचायत सहजपुर में विकराल जल संकट बना हुआ। जहां नल जल योजना गर्मी में भी पीएचई विभाग द्वारा चालू नहीं कराई जा सकी है जिससे यहां के लोग दिन रात पानी की खोज में भटकते रहते। केसली विकासखंड में अधिकांश नल जल योजना विभागीय लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण अपूर्ण पड़ी हुई है जिससे यहां जल संकट बना हुआ है। अनेक नल जल योजना बिजली कनेक्शन और मोटर पंप जल जाने के कारण बंद पड़ी हुई है लेकिन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी लोगों को पीने के पानी उपलब्ध कराने में बेपरवाह बने हुए हैं।

केसली विकासखंड में भी यही हालात

केसली विकासखंड में 64 लाख की लागत से सिंहपुर सतगुवा गांव में आदर्श कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा नल-जल योजना का काम किया गया। इसका 90 फीसदी काम पूरा होने जाने के बाद भी टंकी चालू नहीं की जा सकी है। फिलहाल गांव में सीधी सप्लाई के द्वारा पेयजल वितरण का काम शुरू कराया गया है। इसी तरह 68 लाख की लागत से मेड़की गांव में, 64 लाख की लागत से देवरी के नाहरमऊ में नलजल योजना का हाल बेहाल है। यहां जलस्रोत में पर्याप्त पानी होने के बाद भी लोगों को पीने के पानी की पूर्ति नहीं हो रही है। ग्राम घाटखेरी अनघोरी गांव में 46 लाख की लागत से स्वीकृत नल-जल योजना का 90 फीसदी कार्य पूर्ण है, लेकिन बिजली कनेक्शन नहीं होने के कारण नल योजना अधर में लटक गई है। यहां की टंकी निर्माण में भी अन्य अनियमितताएं की खबर है। इसके अलावा बृहद सुधार योजनाओं के तहत फ्लोह एवं मरामाधो गांव में 6.50 लाख रुपए की लागत से स्वीकृत योजना में कोई भी काम नहीं हो सका है। बसा एवं नांदिया में ठेकेदार द्वारा काम कराया गया है। इसी तरह लघु सुधार योजना के तहत ग्राम बाकोरी में 9 लाख स्वीकृत हुए, लेकिन ठेकेदार द्वारा काम नहीं कराया गया है। सराईवन गांव में 13 लाख 18 हजार हजार की लागत से स्वीकृत योजना बिजली कनेक्शन के अभाव में शुरू नहीं हो सकी है। यही हाल नारायणपुर में बना हुआ है। यहां भी नल-जल योजना बिजली कनेक्शन के अभाव में अनुपयोगी साबित हो रही है। ठेकेदार ने अभी तक कार्य पूर्ण नहीं कराया है। नवलपुर गांव में 11 लाख 98 हजार की लागत से स्वीकृत योजना लगभग पूर्ण हो चुका है, लेकिन इसका समुचित लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। यही हाल इदालपुर का है। केसली विकासखंड के सबसे बड़ा टड़ा गांव में भीषण जल संकट है। नल-जल योजना के तहत पांच किमी दूर से एक सरकारी कुएं से पाइप लाइन के माध्यम से सप्लाई हो है, लेकिन यह पाइप लाइन बेहद घटिया है। इससे पानी रास्ते में ही बर्बाद हो रहा है। ग्राम पंचायत महका पिपरिया के ढेंचुआ गांव में सभी जलस्रोत बंद हैं। लोग ढाई से तीन किमी दूर पानी भरने जाते हैं। लोग बैलगाड़ी व ट्रैक्टरों से पानी लेने जाते हैं।

इस संबंध पीएचई एसडीओ प्रांजलि राय का कहना है कि मैं छुट्टी पर हूं। सोमवार को बात करेंगे। अभी पेयजल संकट के बारे में जानकारी के लिए उपयंत्री को बोला है। वह जानकारी दे सकते हैं। वहीं उपयंत्री आरके दुबे क कहना है कि मुझे जानकारी देने के संबंध में कोई निर्देश नहीं दिए हैं। जहां-जहां जलसंकट है, इसकी जानकारी एसडीओ को उपलब्ध कराई है, वे ही इसका जवाब देंगी।

1406 एसजीआर 153 देवरीकलां। केसली ब्लॉक् के ढेंचुआ गांव में दूर से पानी लाती महिलाएं।

1406 एसजीआर 154 देवरीकलां। देवरी में भी सहजपुर मार्ग पर कौशकिया कॉलोनी में पानी की किल्लत है।

1406 एसजीआर 155 देवरीकलां। देवरी समीपस्थ गांव छीर में अधूरी पड़ी पानी की टंकी।

1406 एसजीआर 156 देवरीकलां। ढेंचुआ गांव में बैलगाड़ी में पानी भर लाना पड़ रहा है।

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शाहगढ़ में खुली सभी बीड़ी ब्रांच बंद, बीडी श्रमिक पलायन को मजदूर

- बड़े दुकानदार लूज बीड़ी खरीदार कर रहे बीड़ी श्रमिकों का शोषण

शाहगढ़। नवदुनिया न्यूज

शाहगढ़ सहित आसपास ग्रामीण क्षेत्रों की आजीविका का मुख्य साधन सालों से बीड़ी उद्योग रहा है, लेकिन कुछ सालों से शाहगढ़ क्षेत्र से बीड़ी कंपनी की सारी ब्रांचें एक-एक कर बंद हो गई है, इससे बीड़ी श्रमिकों के आगे रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है। जानकारों के मुताबिक तेंदूपत्ता की कमी के कारण बीड़ी मजदूर बेरोजगारी की चपेट में आने लगे हैं। क्षेत्र में खेती और बीड़ी के अलावा कोई और रोजगार का मुख्य साधन नहीं है। किसानों के यहां काम करने वाले गरीब परिवारों के भरण पोषण के लिए बीड़ी उद्योग ही एक मात्र सहारा है। लेकिन तेंदूपत्ता की कमी ने इनके अरमानों पर पानी फेर दिया और मजदूर वर्ग अब शहर की ओर भागने लगा है।

सभी बीड़ी ब्रांच व कारखाने बंद

नगरीय क्षेत्र में बीड़ी उद्योग के कुल आठ कारखाने थे। यहां नगर व ग्रामीण क्षेत्रों से भी बीड़ी आती थी, लेकिन वर्तमान में केवल एक कारखाने में ही बीड़ी की खरीदी शुरू हैं। इनमें भी पहले की अपेक्षा कम ही बीड़ी आ रही है। बीआर ब्रांच में पहले एक सप्ताह में लगभग एक करोड़ बीड़ी आती जो अब घटकर केवल दस लाख रह गई है। इसी प्रकार बीएम ब्रांच में पहले एक सप्ताह में एक करोड़ बीड़ी, बीएस दुकान में एक सप्ताह में एक करोड़ बीड़ी, ढोलक ब्रांच की दोनों शाखाएं, बीएस व काले खान ब्रांच व आरसी राठोर ब्रांच में भी इनती ही बीड़ी आती थी, जो सभी बंद हो चुकी हैं।

बीड़ी श्रमिक लक्षमण अहिरवार, विनोद पटेल और कुंजी पटेल का कहना है कि बीड़ी ब्रांचों में काम नहीं बचा है। इससे वे बंद हो रही हैं। इससे रोजगार का संकट आ गया है। अब लोग काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं। श्रमिक राहुल प्रजापति का कहना है कि सरकार को हम गरीब मजदूरों के लिए कोई अन्य साधन की व्यवस्था करनी चाहिए। ताकि गरीबों का पेट पल सके।

पलायन करने लगे बीड़ी मजदूर

तेंदूपत्ता की कमी और सरकारी योजनाओं का सही तरीके से लाभ न मिलने के कारण क्षेत्र से सैकड़ों बीड़ी श्रमिक बड़े शहरों जैसे दिल्ली, इंदौर, पीथमपुर, गुजरात, अहमदाबाद, चेन्नाई, मुंबई, जबलपुर के लिए काम की तलाश में पलायन कर गए हैं। मनीष पटेल, भागचंद, इदौर के लिए और लल्लू प्रजापति राजस्थान, संतोष पटेल दिल्ली, लोकमन अहिरवार दिल्ली जा चुके हैं। इसी प्रकार आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग पलायन कर रहे हैं। क्षेत्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बीड़ी मजदूर है। ऐसे में शासन की योजनाओं का लाभ इन तक आसानी से पहुंचना चाहिए।

लूज बीड़ी पर अंकुश लगाया जाए

बीड़ी उद्योग संचालकों का कहना है कि जब तक मजदूरों को भारत सरकार द्वारा वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक प्रिक्टोरियल वॉर्निग बीड़ी के बंडल से हटाया जाए। घरों में बनाई जा रही भारी तादात में लूज बीड़ी जो कि बिना किसी दस्तावेज टेक्स चुकाए ट्रक के जरिए विभागीय साठगांठ से उत्तर प्रदेश सहित कई प्रांतों में पहुंचने से हमारी कंपनियों द्वारा बनाई जा रही बीड़ी की खपत कम होने लगी है। वहीं शासन द्वारा अत्यधिक टैक्स अधिक थोपे जाने की वजह से भी हमारी ब्रांच में ताले डल गए हैं।

बीड़ी श्रमिकों का दर्द

नोनी बाई अहिरवार वार्ड क्रमांक 15 का कहना है कि पहले बीड़ी बनने के लिए पर्याप्त सामग्री मिल जाती थी। इससे परिवार का भरण पोषण आसानी से होता था, लेकिन अभी कुछ समय से तेंदूपत्ता नहीं मिलने के कारण काम बंद हो गया है। रोजीरोटी के लाले पड़ गए हैं। क्षेत्र के राजाराम, राजकुमार सहित कई श्रमिक बीड़ी उद्योग बंद होने से दिल्ली, आगरा आदि महानगरों के लिए पलायन कर चुके हैं। 70 वर्षीय बीड़ी श्रमिक मौला बाई अहिरवार और रामकली का कहना है कि अभी तक हमें बीड़ी श्रमिक के अंतर्गत मिलने वाली पेंशन नहीं मिल सकी। 12वीं पास छात्रा पूजा अहिरवार का कहना है कि उच्च शिक्षा के लिए उन्हें बीड़ी श्रमिकों को मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। परिवार के लोग घर में बैठकर लूज बीड़ी बनाता है जो बड़ी दुकानों पर बेची जाती है। ऐसी ही स्थिति गंगाबाई, हीराबाई, सलोनी बाई, ममता बाई, जीवन अहिरवार, सुरेश, खुमान, मुकुंदी, सुनील आदि के परिवार जनों ने बताई। इस संबंध में जनपद पंचायत अधिकारी का कहना है कि गरीबों को मनरेगा के तहत काम दिया जाता है। यदि बीड़ी श्रमिक काम न मिलने से पलायन कर रहे हैं तो सचिवों से इसकी जानकारी जुटाई जाएगी।

1406 एसजीआर 151 शाहगढ़। बीड़ी बनाते श्रमिक।

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प्राचीन कुएं की हो रही उपेक्षा, कचरा व गदंगी से पानी हुआ दूषित

- लोग बोले कभी बुझती थी गांव वालों की प्यास, आज दैनिक उपयोग के लायक भी नहीं

नरयावली। नवदुनिया न्यूज

नरयावली ग्राम पंचायत मुख्यालय पर बस स्टैंड से सटकर बना प्राचीन कुआं सदा नीरा है। इसमें भीषण से भीषण जलसंकट में भी पानी रहता है, लेकिन ग्राम पंचायत द्वारा इसकी उपेक्षा किए जाने से इसका पानी उपयोग लायक नहीं बना है। ग्रामीणों का कहना है कि कुएं के पानी की हालत ऐसी है कि कचरा व कूड़ा पड़ा होने से इसका पानी हरा हो गया है। लोगों का कहना है कि करीब दो दशक पूर्व इस कुआं के उपयोग लोगों किए करता था। कुएं के आसपास रहने वाले लोगों को तो जलसंकट की कोई समस्या नहीं थी, लेकिन वर्तमान में इसकी उपेक्षा हो गई है। इसमें प्लास्टिक की बॉटल, कुप्पे, पालीथिन, शराब की बॉटल सहित अन्य कचरा पड़ा है। लोगों का कहना है कि भीषण जलसंकट होने के बाद भी इस कुएं की सफाई की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सूत्रों के मुताबिक पंचायत द्वारा जान बूझकर इसकी उपेक्षा की जा रही है। इसकी सफाई न होने से लोग कुएं का पानी उपयोग नहीं कर रहे। जिससे जल परिवहन व नल-जल योजनाओं के नाम पर पंचायत द्वारा खर्च दर्शाकर राशि निकाली जाती है। लोगों का कहना है कि यदि इस कुएं की सफाई कर दी जाए तो लोगों को बहुत राहत मिलेगी।

1406 एसजीआर 152 नरयावली। बस स्टैंड के पास प्राचीन कुएं की उपेक्षा किए जाने से इसमें कचरा व गदंगी पड़ी है।