शत्रुघन केशरवानी, सागर। Sagar News: बुंदेलखंड के अधिकांश किसानों की फसल पीले मोजेक और इल्लियों के हमले से नष्ट हो गई, लेकिन सागर जिले के कुछ किसानों की फसलें इस विपदा में भी सुरक्षित रहीं। कारण यह कि इन्होंने रासायनिक खाद का नहीं, पंचगव्य का इस्तेमाल किया था। गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, केला, शहद, गुड़ और नारियल पानी मिलाकर बनाई यह औषधि पौधों की इम्यूनिटी बढ़ाती है। इससे पैदावार भी अधिक रहती है।

यह पंचगव्य किसी कृषि विशेषज्ञ ने नहीं, बल्कि खुरई थाने में पदस्थ प्रधान आरक्षक अरविंद सिंह ठाकुर ने तैयार किया। अरविंद ने विशेषज्ञों से मिलकर आयुर्वेद और वेदों का अध्ययन किया। उन्होंने नागपुर की गोशाला जाकर वहां बनाए जा रहे पंचगव्य का प्रभाव देखा, फिर प्रयोग शुरू किया। चार साल के प्रयोग जब परिणाम में बदले तो खेती को नया जीवन मिलता दिखने लगा। जरूआखेड़ा, बहरोल, निर्तला और बीना क्षेत्र में 22 किसानों ने इसका उपयोग किया और उनकी फसलें पीला मोजेक व अन्य रोग से भी सुरक्षित रहीं।

एक एकड़ में आता है 2400 का खर्च

निर्तला ग्राम की सरिता यादव का कहना है कि मैंने मसूर की फसल में इसका उपयोग किया था तो डेढ़ गुना तक पैदावार हुई। अरविंद का कहना है कि एक क्विंटल बीज में एक लीटर पंचगव्य लगता है। बोवनी के बाद पहली अमावस्या में फिर पंचगव्य डालते हैं। अगली पूर्णिमा में तत्व रसायन डालते हैं। आयरन से भरपूर यह रसायन अदरक, लहसुन और प्याज से बनता है। सल्फर के लिए तत्व रसायन, पोटास के लिए बेल-बेर और फॉस्फोरस के लिए बकरी के अपशिष्ट का इस्तेमाल होता है। एक एकड़ की फसल में दो हजार से 2400 रुपये का खर्च आता है।

20 लीटर पंचगव्य में इतनी मात्रा

गोमूत्र- 17 लीटर

गोबर -3 किलो

दूध- 3 लीटर

दही- 3 किलो

शहद-125 ग्राम

गुड़-250 ग्राम

नारियल पानी- 2 लीटर

फसलों के लिए पोषण आवश्यक

फसलों को मुख्य रूप से फॉस्फोरस, नाइट्रोजन और पोटाश की आवश्यकता होती है। द्वितीयक पोषक में सल्फर, जिंक और मैग्नीशियम चाहिए। इसके अलावा जो 17 सूक्ष्म पोषक तत्व हैं, वह मिट्टी के परीक्षण के बाद देते हैं। फसल को ये तत्व परंपरागत औषधियों से भी मिल सकते हैं। - डॉ. केएस यादव, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, सागर

Posted By: Prashant Pandey

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