सागर (नवदुनिया प्रतिनिधि)। उड़द की फसल के बाद सोयाबीन में भी पीला मोजेक लगना शुरू हो गया है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। वहीं एक सप्ताह से वर्षा न होने से भी किसान चिंतित हैं। ढाना के किसान शुभाशीष तिवारी का कहना है कि सोयाबीन में पीला मोजेक बढ़ने से चिंता सताने लगी है। फसल में दवा का छिड़काव भी किया था, लेकिन उससे कुछ फायदा नहीं नजर आ रहा है। फसल में पीला मोजेक की वजह से चिंता बढ़ गई है। इससे उपज बहुत प्रभावित होगी। वहीं दरारिया गांव के किसान सत्तू पटेल का कहना है कि सोयाबीन के पहले उड़द पर पीला मोजेक का अटैक हुआ है। इससे उड़द की फसल खराब हो गई है। अब सोयाबीन की फसल में भी तेजी से पीला मोजेक हो गया है। उड़द की फसल में पीला मोजेक वायरस रोग अधिकांश रूप फैल चुका है तथा सोयाबीन की फसल में भी इस रोग का प्रकोप कहीं-कहीं पर शुरू हुआ है। वहीं कृषि विज्ञानियों की बात करें तो रोगग्रस्त उड़द की फसल के आसपास पीला मोजेक सोयाबीन में भी फैल रहा है। क्योंकि यह एक वायरस जनित रोग है। यह रोग मूंग बीन यैलो मोजेक विषाणु द्वारा उत्पन्ना होता है तथा सफेद मक्खी कीट तथा अन्य रस चूसक कीट इस वायरस (विषाणु) के वाहक का कार्य करते हुए रोग को फसल पर फैलाती है। इन रोगों से पौधे की वढ़वार कम होती है, पौधे छोटे रह जाते है। रोग ग्रसित पौधों की पत्तियां की नसें साफ दिखाई देने लगती हैं, उनका नरमपन कम होना, बदशक्ल होना, ऐंठ जाना, सिकुड़ जाना आदि इस रोग के लक्षण हैं। कभी-कभी पत्तियां भी खुरदरी हो जाती है। इस रोग के लक्षण शुरू में फसल पर कुछ ही पौधों पर प्रकट होते हैं और धीरे-धीरे बढ़कर भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। कृषि विज्ञानियों के अनुसार उड़द सोयाबीन की फसल इस रोग के प्रति अतिसंवेदनशील है और वर्तमान मौसम इस रोग के प्रति अत्यधिक अनुकूल होने पर इस रोग की फैलने की आशंका अधिक है। रोकथाम के लिए यदि खेत में कुछ ही पौधेरोग ग्रसित हो तो उन्हें उखाड़कर जलाना चाहिए। यह रोग कीटों द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे पर और एक खेत से दूसरे में फैलाए जाते हैं। इसलिए इनकी रोकथाम रोग फैलाने वाले छोटे छोटे कीटों को मारकर की जाती है।

किसान यह उपाय करें

विज्ञानियों ने बताया कि फसल में पीला मोजेक रोग आते ही फसल पर बिना विलंब किए डाइमिथोएट 30 ईसी 30 मिलीलीटर प्रति टंकी या मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 25 मिलीलीटर प्रति टंकी या इमिडाक्लोरोप्रिड 8 मिलीलीटर प्रति टंकी या थायोमेथोक्साम 25 डब्ल्यूजी 5 ग्राम प्रति टंकी या एसिटामिप्रिड 4 ग्राम प्रति टंकी, इनमें से किसी एक दवा का छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 7-8 दिन बाद पुनः दोहराएं। फसल पर कीटनाशी घोल की बराबर समुचित मात्रा के लिए 1 हैक्टेयर पर 450 से 500 लीटर घोल का अवश्य छिड़काव करें। घोल में स्टिकर या टीपोल एजी मिलाकर करना अधिक लाभदायक है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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