आष्टा। सुनते बहुत है, पर गुनने का कार्य अभी तक नहीं किया। धर्म को समझने का कार्य हमने अभी तक नहीं किया। बड़े-बड़े आचार्यों ने भी धर्म को बहुत समझाया, धर्म को जो धारण करें स्वीकार करें, वही धर्म है, वस्तु का स्वरूप ही धर्म ही है, वास्तविक धर्म क्या है। संसार मे जो दुख मिल रहा है वह अज्ञानता के कारण मिल रहा है। सनासर समंदर से कैसे पार किया जाए यह सभी आचार्यों ने हमें बताया है। रत्नत्रय की एकता ही मोक्ष मार्ग है। जो धर्म में लग गया मानो वह तरह गया, उसका मोक्ष प्राप्त करना निश्चित ही है। उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्यादय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि श्री निर्मोह सागर महाराज ने अपने आशीष वचन के दौरान कहीं। मुनि श्री ने आगे कहा कि यह नही सोचे हमें स्वर्ग ही जाना है, इसके आगे भी कोई जगह है जो है मोक्ष। थोड़ी सी परेशानी आती है ओर हम धर्म को छोड़ देते है। अपने अंदर धारण करना पड़ेगा जब ही हम दृढ़ निश्चय कर पाएंगे। मुनि श्री निर्मोह सागर महाराज ने कहा अनंत काल से जो संसार भृमण हो रहा है वह अपनी मिथ्या मान्यताओं के कारण हो रहा है। मुनि श्री ने कहा कि नियम लेने से कभी डरना नहीं चाहिए, अपने अंदर की दृढ़ता बनाए रखना चाहिए, भगवान की पूजन प्रतिदिन करना चाहिए।

जो धर्म हमे उत्तम सुख की ओर ले जाने वाला है, उसकी शरण में हमें रहना चाहिए। पल-पल हम कर्मों का आश्रव करते रहते हैं, उसी का हमें प्रक्षेपण करते रहना चाहिए। धर्म से हमेशा हमें जुड़े रहने चाहिए, धर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखना चाहिए, बाकी सब तो यही रखा जाता है, कुछ काम नहीं आना है। शरीर को सजाने में अपने जीवन को व्यर्थ न गंवाएं, अपना विश्वास बना कर रहे। जिस तरह आचार्य विद्यासागर महाराज गुरु व संभव सागर महाराज कहते हैं। धर्म क्षेत्र में संतोष नहीं होना चाहिए पर हमारी विपरीत स्थिति चल रही है, हम करते कम है और अंतरंग में भी कम उतारते हैं, धर्म के क्षेत्र में औपचारिकता न करें, भावों का कोई पता नहीं, ऐसी भक्ति नहीं करें, इस प्रकार करने से हमारा भव भ्रमण नहीं रुकेगा। हमारा कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। आचार्य भगवंत की कृपा दृष्टि आपके नगर पर हमेशा बनी रहती है। उसका भरपूर लाभ ले सदुपयोग करें, हमें अपने अंतरंग की आशक्ति को ही दूर करना है, जो भाव शून्य क्रिया होती है वे फल नहीं देती, हम संसार को कैसे बड़ा रहे है। पंचेन्द्रीय क्रियाओं में ही उलझ कर रह गए है, सत्संगति में हमेशा अपना समय बिताएं, आष्टा में दो नदियां बहती है पार्वती ओर पापनाशिनी, जो जिसके समीप रहता है, उसे उसका महत्व नहीं रहता।

Posted By: Nai Dunia News Network

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