आष्टा। व्यक्ति राग से ही कर्म बंध को बांधता है। जल का गुण शीतलता प्रदान करना है, उसे कितना ही गर्म कर लो, लेकिन वह अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता है। ज्ञान को निर्मल करना उद्देश्य है और राग को दूर करना प्रमुख उद्देश्य रखें। कोई भी चीज है, उसमें आठ पर्याय रहती है। हर वस्तु के दो पहलू माने जाते हैं। दिन-रात, संयोग-वियोग, जिंदगी-मौत। ये सभी आपस में कुदरती तौर पर जुड़े हुए हैं। कहा जा सकता है कि एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह सकारात्मक व नकारात्मक भाव मनुष्य के अंदर हैं। दुख व सुख मनुष्य के जीवन के दो पहलू है। हर रात के बाद दिन का उजाला अवश्य होता है। दुख की परछाई के बाद सुख रूपी सच्चाई छिपी होती है। जैसे कोरोना काल में हम दुख में तो परमात्मा को याद करते हैं, सिर्फ अपना दुख कम करने के लिए, लेकिन जब सुख आता है तो भगवान को भूल सुख में रम जाते हैं।

उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि भूतबलि सागर महाराज व उनके शिष्य मुनि सागर महाराज ने आशीष वचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि पूरा विश्व ही दुखों में घिरा हुआ है, उससे बचा कैसे जाए। यह भाव हमारे जीवन की हर परिस्थिति अपने कर्मों पर आधारित है। इसलिए न ही कोई जीव दोषी है और न ही परमात्मा। बल्कि दोष देने वाले से परमात्मा के चिंतन पर ध्यान दिया जाए। क्योंकि हमारे जीवन की दुखदायी घड़ी तब होती है जब हम परमात्मा का ध्यान सुख के समय में भुला देते हैं। परमात्मा एक ऐसे सच्चे साथी है जब स्वार्थ से भरा संसार दुखों में साथ छोड़ देता है तो वह सतगुरु बन कर साथ निभाते है। इसलिए अगर अपने जीवन की सुख-दुख रूपी परछाई से दूर होकर परम आनंद से जुड़ना चाहते हैं तो सतगुरु की शरण में जाकर परमात्मा को प्राप्त कर आपने जीवन की डोर उनके हाथों में सौंप दें।

Posted By: Nai Dunia News Network

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