आष्टा (नवदुनिया न्यूज)। किसी से ज्यादा अपेक्षा रखना और वो पूरी नहीं होना क्रोध की जन्म देती है। क्रोध की शुरुआत मूर्खता से और अंत पश्चाताप से होता है। मानव को विनयशील बनना चाहिए क्योंकि धर्म का प्रवेश द्वार विनय है। क्रोध मानव को अधोगति में ले जाता है। जीवन को कषाय संसार का भ्रमण करवाता है, जिसका सृजन, क्रोध, मान, माया और लोभ से होता है, हमें सच्ची श्रद्धा से आत्मा के साथ धर्म कर धर्मात्मा बनना है। उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि भूतबलि सागर महाराज ने कही।

याचना भिखारी करते है और भक्त प्रार्थना करते हैं - मुनि सागर महाराज

जब हवा काम नहीं करती तो दवा काम करती है, जब दवा काम नहीं करती तो दुआ काम करती है। दुआओं में प्रार्थना होना चाहिए याचना नहीं, याचना भिखारी करते है, प्रार्थना भक्त करता है। याचना दिमाग से की जाती है और प्रार्थना हृदय से की जाती है। हृदय से भक्ति करने पर चमत्कार होता है, दिमाग से भक्ति तब करते हैं जब कोई चमत्कार दिखाई देता है। यह बात मुनि सागर महाराज ने कही। वे दिगंबर जैन मंदिर किला परिसर में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान जिनेंद्र का अभिषेक हमारे संपूर्ण रोग, शोक को दूर करता है, मन को शांति प्रदान करता है। केवल भगवान का अभिषेक ही नहीं जो भक्त भगवान का सच्चे मन से स्मरण करता है उसकी बीमारियां पर भर भी दूर हो जाती हैं। जो भगवान की कथा सुनता है उसके भी पापों का क्षय हो जाता है। भगवान की प्रतिमा को अपलक दृष्टि से देखो क्योंकि सौधर्म इंद्र तीर्थंकर बालक को 1000 नेत्र बनाकर देता है, फिर भी तृप्त नहीं होता हैं, तो भगवान का भक्त दो नेत्रों से भगवान को देखकर कैसे तृप्त हो सकता है। मंदिर में रखी हुई प्रतिमा हमारे अंदर की प्रतिभा को जागृत करती है। हमें भगवान बनने की प्रेरणा देती है।

मंदिर में जो वैभव प्रदर्शन करता है वह खाली हाथ लौटता है

मुनि भूतबलि सागर महाराज ने कहा कि मंदिर में आत्म दर्शन करने के लिए ही आना चाहिए। अपने वैभव का प्रदर्शन करने नहीं। जो वैभव का प्रदर्शन करने आते हैं वह खाली ही लौट जाते हैं। जो आत्म दर्शन करने आते हैं वह सब कुछ लेकर मंदिर से जाते हैं। मुनिश्री ने कहा कि पेड़ का कल्याण स्पर्श से होता है, जानवरों का कल्याण देख रेख करके होता है। मनुष्य का कल्याण अपने हाथों से भगवान की भक्ति करने से होता है। जो मनुष्य अपने हाथों से दान नहीं देता, भगवान का अभिषेक नहीं करता, मृत्यु के बाद चील-कौवे भी उसके शरीर का मांस खाना पसंद नहीं करते हैं। क्योंकि उसका हाथ और पैर पवित्र हैं। इसलिए अपने होशो-हवास में अपने भाग्य को सौभाग्य में बदल लो नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा। बीता समय लौटकर के वापस नहीं आता, मुख से निकला हुआ शब्द लौटकर के नहीं आता, उसी प्रकार मनुष्य जीवन एक बार हाथ से निकल जाने के बाद दोबारा प्राप्त नहीं होता है।

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Posted By: Nai Dunia News Network

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