आष्टा। निमाड़ी लोक संस्कृति में श्राद्ध पक्ष को संजा आराधना को पर्व के रूप में मनाया जा रहा है। शहर में विलुप्त हो रही इस परंपरा को सहेजने के लिए ऋषभ विहार कॉलोनी में संजय पोरवाल के परिवार ने संजा बनाने से लेकर स्तुति गीत, भोग व आरती तक की लोक परंपरा को ''संजा : अनमोल धरोहर' में तैयार किया है। इसमें 26 चित्रों में संजा बनाना व 25 गीतों की स्तुति, भोग, आरती का संग्रह व विदाई गीत को शामिल किया है। श्रीमती पोरवाल बताती हैं निमाड़ी लोक संस्कृति से शहरी बच्चों के जुड़ाव मजबूत करने के लिए उन्हें सरलता से जोड़ने संग्रहण किया है। श्राद्ध पक्ष में मोहल्लों में संध्या उपासना के साथ बच्चे-बड़ों को बांटकर पर्व मनाने के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। गोबर, फूल व कागज से बना सकते हैं।

अतुल उपाध्याय बताते हैं संजा लोक पर्व में अच्छे वर की कामना व बेटी का महत्व है। किवंदती है किशोरियां अच्छे वर की कामना के लिए 16 दिन पार्वती की आराधना करती हैं। यह लोक पर्व निमाड़-मालवा व राजस्थान के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। संजा की पूजा, स्तुति गीत, भोग व आरती में प्राकृतिक सामग्री को शामिल किया जाता है। परिवार में सुख समृद्धि आती हैं। श्री उपाध्याय बताते है किताब में संजा पर्व की शुुरुआत से विदाई तक की जानकारी है। दीवार पर श्राद्ध पक्ष के 16 दिन में अलग-अलग संजा मांडने के तरीके, पूजन विधि, भोग की सारी प्रक्रिया है। गोबर, फूल व कागज से संजा मांडते हैं। इसमें चांद, सूरज, परकोटा, बैलगाड़ी, चक्की, पूर्वज आदि की कलाकृति शामिल करते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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