आष्टा। मन, वचन, काया से अशुभ कर्म करते हैं तो अशुभ कर्म का फल मिलेगा ही। जिस प्रकार विद्यार्थी स्कूल में पढ़ाई करता है और 12वीं की परीक्षा देता है जो उसका परीक्षा फल भी आएगा। जितनी अच्छी पढ़ाई कर परीक्षा देगा, उतना श्रेष्ठ परिणाम आएगा। इसी धर्म की परीक्षा देंगे तो फल की डिग्री मिलेगी। स्वाध्याय का अध्ययन करना चाहिए, तभी जीवन का कल्याण हो सकता है। सफारी व्यक्ति को स्वाद लेने की जरूरत नहीं है।

यह बात श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि भूतबलि सागर महाराज व मुनि सागर महाराज ने कही। मुनिश्री ने कहा कि धर्म आराधना, तपस्या पुण्य कर्म कर बुरे कर्मों का समाप्त करती है। मोक्ष गति के लिए तप का पुण्य कर्म करना चाहिए, ताकि पाप कर्मों का नाश हो सके। तप कार्य में लगाया समय सदैव पवित्र बन जाता है। मन को सदैव पवित्र रखना चाहिए तभी आत्मा का कल्याण होगा। मुनिश्री ने कहा कि आप लोगों का रसेंद्रिय पर नियंत्रण नहीं है। जहां मिलावट है वह वस्तु का असर नहीं रहेगा। शाकाहारी को स्वाद लेने की जरूरत नहीं है। पूर्वजों में और आप लोगों में काफी अंतर है। पूर्वज आटे में नमक मिलाते थे और आप लोग नमक में आटा मिलाते हैं। सादा जीवन उच्च विचार रखो। मुनि सागर महाराज ने कहा करकश, कठोर शब्द ना बोले। नींबू, सब्जी काट लो नहीं बोले, सुधारने की बात बोलना चाहिए। किसी के भी यहां सूतक-पातक है, वहां भोजन नहीं करना चाहिए। मृत्यु भोज बंद होना चाहिए। लोक रूढ़िवादी आज भी चल रही है। आगम में नहीं है। पाप की गठरी बांध रहे हैं। अधर्म चला रहे हैं। भारत में धर्म ही सुखी बनाएगा और ऊपर उठाएगा। मुनि भूतबलि सागर महाराज ने कहा सूतक पातक वाले के साथ ना जाए। घूमने जाने के लिए समय है और व्यक्ति स्वस्थ है फिर भी ना तो मुनियों के प्रवचन सुनने का समय है ना ही प्रभु के दर्शन करने का।

Posted By: Nai Dunia News Network

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