आकाश माथुर, सीहोर। अगर हौसले मजबूत हों तो मुश्किल हालात भी मात खा जाते हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है जिले की स्व सहायता समूह की दीदीयों ने। स्व सहायता समूह की दीदीयों ने शहर में ही साबुन उत्पादन की शुरुआत कर रोजगार की राह बनाई। इस समूह की दीदीयों ने जो साबुन बनाए हैं। जिसका नाम भी दीदी साबुन ही है। जिससकी मांग कई प्रदेशों में है। फिलहाल उत्पादन ज्यादा नहीं होने से दीदी साबुन सिर्फ शहर और आसपास के जिलों में भी भेजा जा रहा है। दीदी साबुन के झाग से महिलाओं ने खुद के गरीबी के दाग तो धुले ही, साथ ही शहर का नाम भी बढ़ रहा है। इसी तरह जिले के गांव भोजनगर की चटनी भी पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भोजनगर की महिलाएं अचार भी बना रहीं हैं। जिसकी मांग भी लोग कर रहे हैं। भोजनगर की इन महिलाओं को प्रोडेक्ट को बनाने के लिए महिलाओं को एवरेस्ट क्लैम करने वाली मेघा परमार ने प्रेरित किया। साथ ही वही इस उत्पाद की ब्रांड एंबेसेटर मेघा परमार ही हैं। वो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने उन्हें प्रेरित कर रही हैं।

जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं ज्यादा शिक्षित नहीं हैं, पर हौसले की धनी हैं। यही कारण है कि हमारे जिले की महिलाएं हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं। वे अपने साथ पूरे परिवार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। जिले की दुर्गावती आजीविका समूह की महिलाएं साबुन बना रही हैं। जिसकी जिले के अन्य समूहों के माध्यम से साबुन की बिक्री शुरू की। दीदी ब्रांड के इस साबुन ने गुणवत्ता के कारण कुछ ही दिन में बाजार में पकड़ बना ली। साथ ही साबुन के इस व्यवसाय से वर्तमान में 25 महिलाएं जुड़ी हैं। जिन्हें आठ से दस हजार तक आमदनी हो रही है। वहीं भोजनगर की महिलाएं जिन्हें एवरेस्ट क्लैम करने वाली मेघा परमार ने अचार और चटनी बनाने के लिए प्रेरित किया है। वे भी आत्म निर्भर बनने के लिए काम कर रही हैं। उनके उत्पादों की मांग भी पूरे प्रदेश में है। इस उत्पाद का नाम चटकरा है।

सिल बट्टे पर पीसी जाती है चटकारा चटनी

जिले के भोजनगर में बनने वाली चटकारा चटनी की खासीयत यह है कि इसे सिल-बट्टे पर बनाया जाता है। जिससे इसका जायका बढ़ जाता है। वहीं चटनी के साथ बनने वाले अचार के मसाले भी खुद महिलाएं खुद ही गांव में तैयार करती हैं। यह महिलाएं बाजार से खड़े मसाले लाकर पीसती हैं। जिससे अचार का जायका भी बढ़ जाता है। इस बारे में एवरेस्ट क्लैम करने वाली मेघा ने बताया कि मेरी इच्छा है कि महिलाओं को रोजगार मिले और वे आत्म निर्भर बने। उनके बनाए हुए उत्पाद प्रसिद्ध हो और उनका नाम मुझसे भी ज्यादा हो। तब मैं और वो सफल होंगे।

कई महिलाओं को मिला रोजगार

सहायक विकास खंड प्रबंधक भरत मेवाड़ा ने बताया कि सीहोर में समूह लघु उद्योग परिसर में नारी शक्ति आजीविका सामुदायिक प्रशिक्षण केंद्र में महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिसका संचालन दुर्गावती आजीविका समूह द्वारा दिया जा रहा है। परिसर में प्रशिक्षण के साथ साबुन, बेकरी यूनिट और मसाला यूनिट संचालित की जा रही है। जिसमें महिलाएं काम कर ही है। वहीं परियोजना अधिकारी दिनेश बाफा ने बातया कि यहां 45 से 50 महिलाएं रोजगार से जुड़ी हैं। जिसमें से 25 महिलाएं साबुन बनाती हैं। जो कई बड़े और महंगे साबुन को मात करते हैं। इसके साथ ही मसाला यूनिट में 10 महिलाएं और बेकरी में 10 महिलाएं काम कर ही हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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