सिवनी से संजय अग्रवाल/ राजुल नेमा। अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासनकाल में सैनिकों के लिए ऊंचे पहाड़ पर बनवाया गया आदेगांव का बुलंद किला आज भी क्षेत्र की पहचान है। मराठा शासक रघुजी भोंसले के दीवान खड़क भारतीय गोंसाई ने आदेगांव की दुर्गम पहाड़ी पर इस विशाल किले का निर्माण ईंट, पत्थर व चूना- मिट्टी से करवाया था। किले की बाहरी दीवारें आज भी मजबूती के साथ अडिग होकर खड़ी हैं। सदियां बीत गईं लेकिन इन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है। किले में भगवान काल भैरव का प्राचीन मंदिर है, जो लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस किले को देखने आज भी दूर-दूर से लोग आदेगांव पहुंचते हैं। किले के पिछले हिस्से में बड़ा तालाब भी मौजूद है।

तीन एकड़ में फैला है किला

किले की ऊंची दीवारें चारों ओर करीब तीन एकड़ में फैली हुई हैं। बाहरी दीवार (परकोटा) व बुर्ज को छोड़कर आंतरिक सभी संरचनाएं ध्वस्त हो चुकी हैं। इसका मुख्य द्वार पूर्व मुखी है जबकि दूसरा दरवाजा पश्चिम की तरफ खुलता है। इतिहास के जानकारों के मुताबिक मराठा शासक रघुजी भोंसले के गुरु नर्मदा भारती का शासन केंद्र यही आदेगांव था।

हथियारों व सैनिकों के लिए आदेगांव में किले का निर्माण कराया गया था। इस किले का आंतरिक महल अब ध्वस्त हो चुका है। एक दशक पहले पुरातत्व विभाग द्वारा किले के अंदर खुदाई कराई थी। इस दौरान यहां कक्ष, बरामदे व अन्य संरचनाएं होने के सबूत मिले थे। बाद में खुदाई कार्य बंद कर दिया गया।

दूसरे काशी के नाम से प्रसिद्ध है किले का भैरव मंदिर

किले में विराजमान कालभैरव, नागभैरव व बटुकभैरव का पूजन सदियों से होता आ रहा है। लोग इसे दूसरा काशी के नाम से भी जानते हैं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि बनारस (काशी) की तरह यहां पर भगवान कालभैरव की खड़े स्वरूप में प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। यहां पर भैरव अष्टमी बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है।

ब्रिटिश हुकुमत ने छीना आधिपत्य

किले के इतिहास की ज्यादा जानकारी पुरातत्व विभाग के पास भी मौजूद नहीं है। अभिलेखों के मुताबिक मराठा शासक के गुरु नर्मदा भारती से यह किला उनके शिष्य भैरव भारती, धोकल भारती व दौलत भारती को सौंपा गया। बाद में ब्रिटिश हुकुमत ने मराठा शासकों से इस किले का आधिपत्य छीनकर उसे अपने कब्जे में ले लिया था।

मौजूद है श्यामलता का दुर्लभ वृक्ष

किले के पिछले हिस्से में तालाब के नजदीक श्यामलता का विशाल वृक्ष है। कहा जाता है कि दुर्लभ श्यामलता के वृक्ष की पत्तियों में श्रीराधा कृष्ण का नाम लिखा दिखाई देता है। वृक्ष कब और किसने लगाया यह आज भी लोगों के लिए रहस्य की बात है।

आदेगांव का किला मध्य प्रदेश सरकार का संरक्षित स्मारक है। यह पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां मौजूद मंदिर में विराजमान भगवान भैरव की प्रतिमाओं का दर्शन करने लोग यहां दूर-दूर से आते हैं। - आरके सोनी प्रभारी, पुरातत्व शाखा सिवन

मराठा शासक रघुजी भोसले के शासनकाल में तैयार आदेगांव के किले व गढ़ी का इस्तेमाल सैनिकों की छावनी के रूप में किया जाता था। यहां पर सैनिकों का बेड़ा विश्राम के लिए ठहरता था। सैन्य शक्ति को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए मराठा शासकों ने इस बुलंद किले का निर्माण कराया था। आदेगांव का किला आज भी इतिहास की धरोहर है।- संजय जैन संजू, इतिहासकार

Posted By: Prashant Pandey