शहडोल (नईदुनिया प्रतिनिधि)। ठंड का मौसम आते ही आदिवासी अंचल में निमोनिया ने पैर पसारना शुरू कर दिया है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है जहां जागरूकता का आभाव है, नवजात जब तक ज्यादा गंभीर नहीं होता तब तक उसे देशी उपचार के माध्यम से ठीक करने की कोशिश की जाती है। इसके बाद जब वह गंभीर हो जाता है तो उसे आनन-फानन में जिला अस्पताल लाया जाता है। डॉक्टर उसे ज्यादा गंभीर देख मेडिकल कॉलेज जबलपुर के लिए रेफर करते हैं, लेकिन नवजातों को गंभीर हालत में शहडोल से जबलपुर ले जाने के लिए कोई सुविधा नहीं है। इस कारण भी आए दिन नवजातों की मौत जिला अस्पताल के एसएनसीयू और पीआईसीयू वार्ड में हो रही है। हाल ही में लगातार हो रही मौत में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें जिला अस्पताल प्रबंधन ने नवजातों को मेडिकल कॉलेज जबलपुर के लिए रेफर किया लेकिन कोई साधन नहीं होने के कारण परिजनों ने उन्हें ले जाने से मना कर दिया।

नहीं है नवजातों के वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस

आदिवासी बाहुल्य संभाग में छोटे बच्चों को गंभीर हालत में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए वेंटिलेटर वाला एंबुलेंस नहीं है। कुछ निजी अस्पतालों के पास वेंटीलेटर वाले एंबुलेंस हैं लेकिन वे वयस्कों के लिए हैं। नवजातों को वेंटीलेटर से वेंटीलेटर सिस्टम में रखकर ले जाने के लिए कोई सुविधा नहीं है। यदि किसी सक्षम परिवार के घर इस प्रकार की परेशानी आती है तो वे पहले जबलपुर से नवजातों के वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस बुलाते हैं इसके बाद उसे लेकर जबलपुर के किसी निजी अस्पताल लेकर जाते हैं। इस समस्या से हर दिन लोगों को परेशान होना पड़ रहा है।

वेंटीलेटर सुविधा नहीं मिलने से दम तोड़ रहे नवजात

विशेषज्ञों ने बताया कि वेंटीलेटर सिस्टम में रहने वाले मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए वेंटीलेटर सिस्टम की ही जरूरत होती है। यह नवजात और वयस्क दोनों के लिए होता है। जब किसी नवजात को वेंटीलेटर में रहने के बाद दूसरे अस्पताल में रेफर किया जाएगा तो उसे वेंटीलेटर सिस्टम में ही लेकर जाना होगा। इन बच्चों को यदि बिना सपोर्ट सिस्टम के रेफर किया जाएगा तो ये रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। शहडोल से जबलपुर के लिए रेफर किए गए कई नवजातों की मौत इस कारण से हो चुकी है।

केस-01

साधन नहीं था इस कारण नहीं ले गए, हो गई मौत

अनूपपुर जिले के थाड़ीपाथर में रहने वाली 4 माह की रागिनी बघेल की मौत भी वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण हुई है। पिता शिवदास बघेल ने बताया कि रागिनी का डबल निमोनिया बिगड़ गया था। उसे गंभीर हालत में अनूपपुर के जिला अस्पताल लाया गया वहां से डॉक्टरों ने रागिनी को शहडोल के एसएनसीयू वार्ड के लिए रेफर कर दिया गया। रागिनी को अनूपपुर से शहडोल सामान्य वाहन से लाया गया। शहडोल में जब हालत बिगड़ने लगी तो उसे वेंटीलेटर में रखा गया। कुछ देर बाद उसे जबलपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर किया गया। रागिनी को ले जाने के लिए वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस नहीं था। लिहाजा परिजनों ने रागिनी को जबलपुर ले जाने से मना कर दिया और कुछ घंटों के बाद रागिनी ने जिला अस्पताल शहडोल में दम तोड़ दिया।

केस-02

एंबुलेंस नहीं होने के कारण नहीं ले जा पाया

बुढ़ार निवासी एक परिजन ने बताया कि उनके यहां प्री मिच्यौर डिलेवेरी हुई। वे गंभीर हालत में नवजात को लेकर जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड पहुंचे। डॉक्टरों ने 600 ग्राम के नवजात को वेंटीलेटर में रख तो लिया लेकिन इनके पास इक्यूवेटर सिस्टम नहीं था। इसके लिए परिजनों को नवजात को लेकर शहडोल से जबलपुर मेडिकल कॉलेज जाना था। डॉक्टरों का कहना था कि बिना वेंटीलेटर के उसे नहीं ले जाया जा सकता। परिजन वेंटीलेटर वाले एंबुलेंस के लिए परेशान होते रहे लेकिन वे वाहन नहीं मिला। नतीजन सुविधाओं के आभाव में नवजात ने जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में ही दम तोड़ दिया। परिजनों का कहना था कि यदि शहडोल में नवजातों के वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस होता तो उनके साथ यह घटना नहीं होती।

इनका कहना है

नवजातों के वेंटीलेटर वाले एंबुलेंस जिला अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं। इसके लिए शासन स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं। यह बात सही है कि वेंटीलेटर वाला एंबुलेंस नहीं होने से नवजातों को रेफर करने के बाद उन्हें ले जाने में स्वजनों को परेशानी होती है।

डा वीएस वारिया

सिविल सर्जन, जिला अस्पताल शहडोल

Posted By: Nai Dunia News Network

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