- मां लालबाई-फूलबाई की शाही सवारी में हजारों भक्त होंगे शामिल

अवंतिपुर बड़ोदिया। नईदुनिया न्यूज

प्रसिद्ध मां लालबाई-फूलबाई की शाही सवारी शरद पूर्णिमा की रात में निकलेगी। इस दौरान अवंतिपुर बड़ोदिया में श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा। आसपास के गांवों से हजारों लोग मां के दर्शन करने के लिए पहुंचेंगे। रविवार को पूरे दिन धार्मिक आयोजन चलेंगे, जबकि रात में सवारी की तैयारियां प्रारंभ होंगी और देर रात तक धार्मिक कार्यक्रम होंगे। शरद पूर्णिमा की रात में ब्रह्ममुहूर्त में तड़के चार बजे परंपरागत रूप से निकाली जाएगी। इसके दर्शन हेतु दूर-दूर से लगभग 50 हजार श्रद्धालु अवंतिपुर बड़ोदिया में जुटेंगे। करीब 600 साल से मां की सवारी निकाली जा रही है।

जानकारी के अनुसार एक नवयुवक को मां के श्रृंगार में श्रृंगारित कि या जाता है। इसके बाद ब्रह्ममुहूर्त में तड़के चार बजे श्रृंगारित युवक को मंदिर में मां लालबाई-फूलबाई की प्रतिमा के समक्ष लाकर पूजा-अर्चना और आरती की जाती है। वहीं बलि के रूप में भूरा कोला (कु ष्मांड) का फल, श्रीफल व नींबू को तलवार से काटा जाता है, फिर सवारी गांव के मुख्य मार्ग से निकलती है। मां के रौद्र रूप को शांत करने के लिए सवारी मार्ग में हजारों नारियल बधारे जाते हैं। सिंह पर सवार मां के हाथों में तलवार, जलता खप्पर, शरीर के समस्त अंगों में सोने-चांदी के आभूषण पहनाए जाते हैं। मां के आकर्षक श्रृंगार के दर्शन श्रद्धालु करते हैं। करीब आधे घंटे बाद सवारी का समापन गरीबनाथ धाम परिसर में होता है।

पांच दिनी कार्यक्रम

इस परंपरागत शरदोत्सव कार्यक्रम को सभी समाज के लोग मिलकर दशहरे के बाद वाली एकादशी से पांच दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन से प्रारंभ करते हैं। इसमें स्थानीय व बाहर के कलाकार मिलकर धार्मिक नाटक, नृत्य, आदि का प्रदर्शन करते हैं। अंतिम पांचवें दिन अर्धरात्रि के पश्चात शाही सवारी निकाली जाती है। इस दिव्य, अद्भुत एवं दुर्लभ दर्शन की एक झलक पाने के लिए हजारों भक्त दूर-दूर से मां की नगरी में आते हैं।

मंदिर का इतिहास

मां लालबाई-फूलबाई मंदिर की स्थापना के संबंध में कोई ज्ञात लिखित ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं है किंतु बताया जाता है कि माता की पाषाण प्रतिमा नेवज नदी के तट पर प्राचीन काल में एक चबूतरे पर स्वतः ही प्रकट हुई थी। तब चबूतरे के आसपास कोई बसाहट नहीं थी। धीरे-धीरे बस्ती का विस्तार होता गया और मंदिर एक संकरी गली में सिमटकर रह गया। संत गरीबनाथ बाबा मातारानी के अनन्य भक्त थे, जो कि संवत 1245 ई. में तीर्थाटन करते हुए बड़ोदिया नगरी पहुंचे थे और मंदिर के समीप ही कु टिया बनाकर रहते थे। संभवतः तभी से ही मां लालबाई फूलबाई की शाही सवारी की परंपरा आरंभ हुई होगी। मान्यता है कि इस दिन मां की मूर्ति तीनों पहर में अपना स्वरुप बदलती है। प्रतिपहर एक आभा से युक्त होती है।

बॉक्स लगाएं...

रात 12 बजे से शुरू होगी श्रृंगार की प्रक्रिया

मां लालबाई-फूलबाई के प्रति जनमानस की सच्ची श्रद्धा एवं आस्था का प्रमुख कारण है मां का नगर भ्रमण पर निकलकर भक्तों को साक्षात दर्शन देना। मां की शाही सवारी हेतु प्रतिवर्ष कि सी नवयुवक को श्रृंगारित कि या जाता है। बुजुर्गों का कहना है कि जिस युवक को मां दुर्गा की वेशभूषा में श्रृंगारित कि या जाता है, उसे स्वयं मां स्वप्न देती है अथवा ऐसा संकेत, मार्गदर्शन या परिस्थितियां निर्मित कर देती है कि वह स्वयं मंदिर में प्रतिमा के समक्ष आकर श्रृंगारकर्ता पंडों को इस संबंध में अवगत करवा देता है। इसके बाद स्नान, मंत्रशुद्धि के साथ शुद्ध वस्त्र पहनाकर गुप्त स्थान पर श्रृंगार की प्रक्रिया रात 12 बजे से प्रारंभ हो जाती है। इसमें नवयुवक को सोने-चांदी के आभूषणों से सुसज्जित कर तड़के चार बजे मंदिर में चैतन्य प्रतिमा के समक्ष लाकर अनुभवी विद्वान पंडितों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना, आरती करवाकर बलि के रुप में भुरा कोला तलवार से कटवाया जाता है। इसी दौरान मां का अंश श्रृंगारित युवक में प्रवेश कर जाता है, जिन्हें गाड़ी पर सिंह बने एक बलिष्ट व्यक्ति को मुखौटा पहनाकर पीठ पर विराजित कि या जाता है और तलवार व जलता हुआ खप्पर हाथों में थमाया जाता है। इस दौरान हाथ-पैर व सांसें फूलने लगती हैं। शरीर भारी हो जाता है। भृकु टिया तन जाती है। देखते ही देखते श्रृंगारित युवक साक्षात मां दुर्गा का रूप हो जाता है। मंदिर से सवारी निकलने पर राधा-कृष्ण द्वारा आरती उतारी जाती है। भक्तों द्वारा भेंट चढ़ाए हजारों नारियल बधारे जाते हैं। सवारी के दौरान मां को उत्साहित करने हेतु जयकारे लगाए जाते हैं। इसी बीच भीड़ में कि सी व्यक्ति को राक्षस शरीर में प्रवेश कर जाता है, जो सवारी के सम्मुख उपद्रव मचाने का प्रयास करता है किंतु उसे सवारी से दूर एकांत में ले जाकर शांत कि या जाता है। सवारी मंदिर से प्रारंभ होकर, सराफा बाजार, सिद्धेश्वर मंदिर, गरीबनाथ धाम से मीराबाई मंदिर में समाप्त होती है।

12एसजेआर12- अवंतिपुर बड़ोदिया में विराजित मां लालबाई-फूलबाई।