-इंडियन सोसायटी फार बुद्धिस्ट स्टडीज के सम्मेलन का समापन आज

शाजापुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

दुपाडा रोड स्थित प्राच्यविद्यापीठ में इंडियन सोसायटी फार बुद्धिस्ट स्टडीज का 19वें अखिल भारतीय वार्षिक सम्मेलन में विद्वानों द्वारा अपने विचार रखे जा रहे हैं। दो दिनों में 30 शोधपत्र प्रस्तुत किए जा चुके हैं। प्रस्तुत शोधपत्रों पर सवाल-जवाब का दौर चला। रविवार को तीसरे दिन सम्मेलन का समारोहपूर्वक समापन होगा।

इंडियन कौंसिंल फार हिस्टोरिकल रिसर्च, इंडियन कौंसिल फोर फिलोसोफिकल रिसर्च के आंशिक सहयोग से राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जैन विद्वान डॉ. सागरमल जैन के सान्निाध्य में सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। तीन दिवसीय सम्मेलन में जैनधर्म और बौद्धधर्म के विविध आयामों के तुलनात्मक अध्ययन पर देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्राध्यापक गण, विषय, विशेषज्ञ और रिसर्च स्कॉलर्स अपने शोध पत्रों का वाचन कर रहे हैं।

संस्कृति, पुरातत्व, साहित्य, दर्शन आदि विषयों पर शोध प्रस्तुत

यहां भारत के सात राज्यों एवं बांग्लादेश से भी विद्धान आए हैं। प्रस्तुत शोधपत्रों में मुख्य रूप से जैन एवं बौद्ध धर्म में सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था, इतिहास, संस्कृति, नियम, सांस्कृति मूल्य, पुरातत्व, साहित्य, दर्शन, योग, ध्यान, धर्म, आदि विविघ विषयों पर आधारित हैं।

12 एसजेआर 19-दोपहर के सत्र में कार्यशाला में उपस्थित विद्धान।

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'पाली भाषा बुद्ध के शांति के उपदेशों व साहित्य की भाषा'

पाली भाषा बुद्ध के शांति के उपदेशों व साहित्य की भाषा है, इसीलिए पीएम नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा था कि हम उस देश के वासी हैं, जिसने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिए हैं। बौद्ध धर्म व पाली भाषा का ज्ञान होने से भारत देश का चीन, जापान, कोरिया, कंबोडिया, वियतनाम श्रीलंका जैसे देशों से आपसी संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ाने में सहायक होगा। यह कहना है कि नवनालंदा विश्वविविद्यालय में पाली विभाग में प्रोफे सर डॉ. रामनक्षत्र प्रसाद का। इंडियन सोसायटी फार बुद्धिस्ट स्टडीज नामक संस्था का 19वें अखिल भारतीय वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने आए डॉ. प्रसाद ने नईदुनिया से चर्चा में कहा कि प्राचीन काल में वैदिक धर्म के कुछ कालखंड विकृतियां आई, जिनकी वजह से समाज में ऊंच-नीच की भावना गहराने के साथ ही समता के भाव में कमी आई। इस बीच धरा पर बुद्ध व महावीर का पदार्पण हुआ। उनके उपदेशों व शिक्षाओं से समाज में जात-पात, रुढ़ियां, कर्मकांड, पशु बलि यहां तक की नरबलि तक जैसी कु रीतियों को दूर करने में मदद मिली। शांति व सद्भाव के उनके संदेशों ने विश्वकल्याण की भावना के प्रति लोगों को अग्रसर कि या। समाज में शुचिता लाने के लिए इन दोनों धार्मिक गुरुओं ने लगातार प्रयास किए, फिर संत कबीर, ज्योतिबा फू ले, गुरुनानक देव, राजा राममोहन राय आदि ने भी सामाजिक कु रीतियों को दूर करने के प्रयास किए। जैन व बौद्ध धर्म के विचारों पर मंथन के लिए इस तरह की कार्यशालाओं के आयोजन हो रहे हैं। हमारा उद्देश्य है कि चर्चा कर उनके संदेशों को आमजनों तक पहुंचाया जाए, जिससे सामाजिक कटुता व वैमनस्यता दूर होकर अच्छा समाज स्थापित हो सके ।

बौद्ध अध्ययन बड़ा खास विषय

जम्मू यूनिवर्सिटी में बौद्ध अध्ययन के सेवानिवृत्त प्रोफसेर डॉ. ललित गुप्ता ने चर्चा में बताया कि बौद्ध अध्ययन बड़ा खास विषय है। यह विषय भारत की कु छ गिनी-चुनी यूनिवर्सिटी जिसमें जम्मू, दिल्ली, बनारस, शांतिनिकेतन, राजस्थान आदि में हैं। संगोष्ठी में बौद्ध अध्ययन पर जितने भी विद्वान विचार प्रस्तुत करते हैं, शोध पत्र पढ़ते हैं, उन पर मंथन कि या जाता है। उन्होंने बताया कि शाजापुर में अधिवेशन करने का उद्देश्य शाजापुर के जैन विद्वान डॉ. सागरमल जैन द्वारा किए गए कार्यों के प्रति हमारी आस्था है। जैन धर्म के विद्वान होने के साथ ही उन्होंने बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। शाजापुर स्थिति प्राच्य विद्यापीठ आज कि सी तीर्थ से कम नहीं है।

शाजापुर जैसे शहरों को भी मिले राष्ट्रीय स्तर की पहचान

शाजापुर में इंडियन कौंसल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च के असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. सुरेश कु मार ने चर्चा में बताया कि शाजापुर में राष्ट्रीय स्तर की इस संगोष्ठी के आयोजन के विषय में बताते हैं कि अममून देखने में आता है कि बड़े आयोजनों के लिए छोटे शहरों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। दिल्ली, मुबंई, कोलकाता, जम्मू आदि जगह ऐसे कार्यक्रम होते हैं, लेकि न छोटे शहरों का भी अपना इतिहास व महत्व है। डॉ. सागरमल जैन जैसे विद्वान द्वारा प्राच्य विद्यापीठ की स्थापना करने के साथ ही धर्म व दर्शन के प्रति जो सेवा की जा रही है वह अदभुत है, इसीलिए हमने यह कार्यशाला आयोजित कर बड़े शहरों के शोधार्थियों को शाजापुर लाने का कदम उठाया। डॉ. जैन द्वारा जैन परंपरा के लिए काम कि या उनसे सभी को रुबरु कराया जाए। छोटे शहरों के इतिहास व परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर तक लाया जाना भी हमारा उद्देश्य है। इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए हमने शाजापुर का चयन कि या है।

12 एसजेआर 20-डॉ. रामनक्षत्र प्रसाद।

12 एसजेआर 21-डॉ. ललित गुप्ता

12 एसजेआर 22-डॉ. सुरेश कु मार।