सुसनेर (आगर), Sawan 2021। यहां से सात किलोमीटर दूर विंध्यांचल की पहाड़ी पर स्थित पंचदेहरिया महादेव मंदिर का इतिहास अद्भुत है। पांडवों द्वारा निर्मित यह मंदिर लाल रंग के पत्थर से बना है और इसी पत्थर को काटकर शिवलिंग का निर्माण भी किया गया था। इस मंदिर का उल्लेख शिव पुराण में भी मिलता है। कई सालों से साधु-संत यहां तपस्या करते आ रहे हैं।

मंदिर का शिखर भी पत्थर का ही है

ज्योतिषाचार्य पंडित बालाराम व्यास के अनुसार वे बचपन से ही इस मंदिर में पंडित हैं और शिव की उपासना करते आ रहे हैं। उनके पूर्वजों ने भी इस मंदिर में आराधना की है। वह बताते हैं कि मंदिर के ऊपर का शिखर भी पत्थर से ही बना हुआ है।

इतिहास - महाभारत काल में पांडवों ने अपना अज्ञात वास विंध्याचल की पहाड़ी पर पंचदेहरिया पर बिताया था। यहां शिव की आराधना के लिए भीम ने एक लाल रंग के पत्थर को काटकर एक मंदिर और उसी पत्थर से एक शिवलिंग का निर्माण किया था। पांचों पांडवों ने इस मंदिर को पंचदेहरिया महादेव का नाम देते हुए माता कुंती के साथ शिव की आराधना की गई। इसी कारण आज भी इस मंदिर को पांडवकालीन पंचदेहरिया महादेव मंदिर कहा जाता है। मंदिर के पास ही पांडवों के रहने के लिए कुछ गुफाएं बनाई गई थीं। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था के अनुरूप मंदिर को नए स्वरूप में बदला गया है। अंदर से देखने पर गर्भगृह वह आसपास गुफाएं एक ही पत्थर पर बनी हुई दिखाई देती हैं। पांच पांडवों की कुटिया यहां पर आज भी मौजूद है।

महाकाल के स्वरूप में है शिवलिंग

पंचदेहरिया महादेव मंदिर में विराजित शिवलिंग उज्जैन के महाकालेश्वर जैसा दिखाई देता है। इसमें नीचे की ओर पीतल का कवच चढ़ा हुआ है तो शिवलिंग की आकृति भी काफी बड़ी है। ऐसी मान्यता है कि प्रतिवर्ष यह शिवलिंग तिल के समान बढ़ता है।

मंदिर में भीम की गुफा मौजूद

पंडित बालाराम व्यास के अनुसार यहां भीम ने शिव आराधना के लिए एक छोटी -सी गुफा बनाई थी। वर्तमान में यह जगह पंडितों के रहने के लिए एवं पूजन सामग्री रखने के काम आ रही है। यहां से करीब 500 मीटर दूरी पर दूसरी पहाड़ी पर एक गुफा स्थित है, जहां पांडव रहते थे।

Posted By: Prashant Pandey

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