(नईदुनिया एक्सक्लूसिव)

- मनरेगा बजट से बन रही गौशालाओं में 90 फीसदी से ज्यादा राशि सामग्री पर खर्च हो रही, जबकि सामग्री पर 40 फीसदी ही खर्च कर सकते हैं।

- पंचायतों की हालत ऐसी है कि मनरेगा मजदूरी देना है तो सीसी सड़क, स्टॉप डैम जैसे निर्माण कार्यों पर एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती।

हरिओम गौड़

श्योपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

गांवों में बन रही गौशालाओं से बेसहारा मवेशियों का कितना भला होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन इन गौशालाओं ने मनरेगा योजना का पूरा हिसाब गड़बड़ा दिया है। गौशालाओं पर जिस तरह मनरेगा की राशि खर्च हो रही है, उससे मनरेगा मजदूरों को काम और मजदूरी का भुगतान देने पर संकट आ गया है। अभी तो गौशालाओं का निर्माण शुरू हुआ है, जैसे-जैसे गौशालाओं की संख्या बढ़ रही है वैसे-वैसे मनरेगा मजदूरों की मजदूरी पर संकट गहराता जा रहा है।

दरअसल, गौशालाओं का निर्माण मनरेगा फंड से हो रहा है और मनरेगा फंड को खर्च करने के मानक पहले से तय हैं। सरकार के तय मानकों के हिसाब से मनरेगा का 40 फीसदी बजट ईंट, सरिया, पत्थर, सीमेंट, गिट्टी जैसी निर्माण सामग्री खरीदने पर और 60 प्रतिशत बजट मनरेगा मजदूरों को भुगतान करना होता है। गौशालाओं के निर्माण ने यह खर्च का यह पूरा गणित तहस-नहस कर दिया है, क्योंकि गौशालाओं में मनरेगा मजदूरों से 08 फीसदी भी काम नहीं करवाया जा रहा। एक गौशाला में औसतन 28 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं, जिसमें से 92 फीसदी से ज्यादा खर्च निर्माण सामग्री पर हो रहा है। मनरेगा मजदूरों के हिस्से का पैसा गौशालाओं के निर्माण में खर्च हो रहा है, इस कारण मजदूरी का बजट कम पड़ता जा रहा है। इसका असर मनरेगा मजदूरों के रोजगार पर पड़ेगा।

मजदूरी दी तो निर्माणों पर लगाना पड़ेगा ग्रहण

इन हालातों में अगर मनरेगा मजदूरों को मजदूरी देनी है तो प्रशासन को ग्राम पंचायतों में होने वाले निर्माण कार्यों पर पूरी तरह रोक लगानी होगी। एक पंचायत साल में औसतन 15 लाख रुपए का बजट निर्माण पर खर्च करती है। इससे गांवों में सीसी सड़कें, स्टॉप डैम व अन्य निर्माण होते हैं। गौशालाओं के निर्माण से मनरेगा के बिगड़े हुए साठ-चालीस के अनुपात को सही करना है तो, इन निर्माण कार्यों पर पूरी तरह रोक लगानी होगी। इस ओर प्रशासन ने कदम भी बढ़ा दिए हैं। पांच दिन पहले सलापुरा पंचायत के रहवासी पूर्व विधायक बृजराज सिंह चौहान को साथ लेकर सीसी सड़क निर्माण की मांग लेकर जिपं सीईओ हर्ष सिंह के पास गए तो उन्होंने बताया कि, मनरेगा में निर्माण के लिए फंड नहीं बचा है।

इसलिए बिगड़ा मनरेगा का हिसाब-किताब

गौशालाओं का निर्माण मप्र का पशुपालन विभाग करवा रहा है, लेकिन इनके निर्माण के लिए पशुपालन विभाग या मप्र सरकार ने एक रुपए तक का बजट किसी अन्य मद से नहीं किया है। गौशालाओं के निर्माण का पूरा भार मनरेगा योजना पर डाल दिया है। यही कारण है कि, जिससे मनरेगा का गणित ऐसा बिगड़ा है कि, पंचायत चुनाव सिर पर हैं और गांवों में सीसी निर्माण व रोजगार गारंटी के कामों पर संकट गहराता जा रहा है।

पहले चरण में 280 करोड़ हो रहे खर्च

मप्र सरकार ने पहले चरण में 1000 गौशालाओं के निर्माण का लक्ष्य रखा है, जो दिसंबर महीने के अंत तक पूरा करना है। एक गौशाला पर औसतन 28 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। इस हिसाब से 1000 गौशालाओं पर तकरीबन 280 करोड़ रुपए खर्च होने हैं, जो मनरेगा से होंगे। इस 280 करोड़ में से 180 करोड़ रुपए मजदूरी पर खर्च होना था जो निर्माण सामग्री में खर्च हो रहा है। श्योपुर जिले में पहले चरण में 16 गौशालाएं बन रही हैं, जिन पर 4.84 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।

वर्जन

- यह सही है कि गौशालाओं के निर्माण में 90 फीसदी से ज्यादा पैसा सामग्री पर खर्च हो रहा है, जबकि मनरेगा का 60 फीसदी बजट मजदूरी व 40 फीसदी ही बजट सामग्री पर खर्च हो सकता है। गौशालाएं बनने के बाद हमें पंचायतों के अन्य निर्माण कार्य रोकने पडेंगे, और मनरेगा मजदूरों को रोजगार दिलाने के लिए बिना सामग्री वाले काम ही पंचायतों में करवाए जा सकते हैं।

हर्ष सिंह

सीईओ, जिपं श्योपुर

फोटो : 03

कैप्शन : नागदा गांव में बनी चंबल संभाग की पहली गौशाला।

Posted By: Nai Dunia News Network

fantasy cricket
fantasy cricket