शिवपुरी (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

जिंदगी आइसक्रीम की तरह है। कुछ करो या न करो आइसक्रीम अंततः पिघल ही जाती है। ठीक उसी तरह जिंदगी का फंडा है। चाहे तो उपयोग कर लो और चाहे तो यूं ही गंवा दो। जिंदगी लंबी है या छोटी है यह अर्थहीन बात है। जिंदगी लंबी होते हुए भी उबाऊ और बोझहीन हो सकती है। यदि हमें जीना नहीं आया तो और छोटी होते हुए भी मजेदार और आनंदपूर्ण बन सकती है, वशर्त हमें जीना आए। आराधना भवन में चल रहे सत्संग में जैन मुनि कुलदर्शन विजय जी ने उक्त मार्के की बात कही। उन्होंने कहा कि जिंदगी मजेदार तब बनती है, जब जीवन में शांति होती है, शरीर में स्वास्थ्य की अनुकूलता और परिवार में प्रेम का वातावरण होता है। आचार्य कुलचंद्र सूरि जी महाराज साहब के सानिध्य में शिवपुरी जैन समाज में चार्तुमास काल में अनवरत तपस्याओं का सिलसिला भी लगातार जारी है। साध्वी शासन रत्ना श्री जी और साध्वी अक्षयनंदिता श्री जी की सुशिष्या एक साध्वी जी का आज 20वां उपवास है और उनकी 31 उपवास करने की भावना है। वहीं एक साध्वी जी का ओली व्रत चल रहा है। इसके अलावा सिद्धी तप, आयम्बिल तपस्याएं भी लगातार जारी हैं।

संत कुलदर्शन विजय जी ने कहा कि आप जीवन की उलझनों में कितने भी उलझो। धन, सम्पत्ति और यश कमाने में जीवन लगाओ। लेकिन ध्यान रहे कि मन की शांति समाप्त नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी दिनचर्या आपको यहीं बात ध्यान रखकर सेट करनी चाहिए। मन की शांति नापने का भी पैमाना है? उन्होंने बताया कि यदि रात्रि में बिस्तर पर जाते ही आपको नींद आ जाए तो समझो आपका मन शांत है। दूसरा पैमाना यह है कि जब आप धर्म करो तब आपका मन विचलित न हो। उन्होंने आगे कहा कि मन को संभालने के अलावा जीवन को मजेदार बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आपका स्वास्थ्य ठीक रहे। शरीर बिगड़े, आप ऐसा कोई काम न करें। जीवन में व्यसनो को तिलांजलि दें। जिंदगी मजेदार बनाने का तीसरा सूत्र यह है कि परिवार का स्नेह बना रहे। व्यस्तता कितनी भी हो लेकिन परिवार का साथ और स्नेह आपसे छूटना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले परिवार में समूह भजन और समूह भोजन का प्रचलन था, जो अब समाप्त हो गया है।

जिंदगी हो तो नदी, उपवन, दीपक, पर्वत और वृक्ष जैसी

पंन्यास प्रवर कुलदर्शन विजय जी ने पांच तरह की जिंदगी को श्रेष्ठ जिंदगी की संज्ञा दी है। उन्होंने कहा कि नदी जैसे जीवन में दो खूबियां होती हैं, एक तो बहते रहो और दूसरी देते रहो। यहीं कारण है कि नदी की सर्वत्र पूजा होती है। दानी व्यक्ति का जीवन नदी जैसा होता है। दूसरी श्रेष्ठ जिंदगी उपवन जैसी होती है। जैसे गुणी व्यक्ति। संतों का जीवन उपवन जैसा होता है। जिसमें निस्वार्थता और निरंतरता जैसी विशेषताएं होती हैं। दीपक जैसी जिंदगी उन लोगों की होती है, जो चारों और अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। प्रकाश फैलाना और परमार्थ करना उनका धर्म होता है। पर्वत जैसी श्रेष्ठ जिंदगी उन व्यक्तियों की होती है, जिनके जीवन में स्थिरता होती है जबकि वृक्ष जैसी जिंदगी उन लोगों की होती है जो विनम्र होते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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