किताब 'धूप में नंगे पांव' पर हुई समीक्षा बैठक

शिवपुरी। नईदुनिया प्रतिनिधि

'पाठक मंच, शिवपुरी' ने विगत दिवस कथाकार स्वयं प्रकाश की किताब 'धूप में नंगे पांव' पर समीक्षा बैठक आयोजित की। स्थानीय गांधी सेवाश्रम में आयोजित इस समीक्षा बैठक की शुरूआत करते हुए विनय प्रकाश जैन ने कहा 'धूप में नंगे पांव' कथेतर किताब है। यह किताब आत्मकथा, संस्मरण, रिपोर्ताज का मिलाजुला रूप है। गद्य की सभी विधाओं का इसमें समावेश है। किताब उनके अनुभवों का लेखा-जोखा है। प्रमोद भार्गव ने कहा, परिपक्व संस्मरण की खासियत यह होती है कि उसकी चित्रात्मकता प्रभावित करे। इस मायने में यह किताब पूरी तरह से खरी उतरती है।

स्वयं प्रकाश ने जिस क्षेत्र में जो अनूठा देखा, उसे किताब में कुशलता से अभिव्यक्त किया है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा राज्य के सभी जिलों में पाठक मंच केंद्रों की स्थापना की गई है। अकादमी इन पाठक मंचों को हर महीने एक किताब भेजता है, जिसको पढ़कर लेखक पाठक इस पर संवाद करते हैं। अरुण अपेक्षित ने कहा, जिस लेखक के जीवन में जितना अनुभव होता है, उसका लेखन उतना ही सशक्त होता है। स्वयं प्रकाश के लेखन में अध्ययन और अनुभव दोनों हैं। अलबत्ता यह बात जरूर कहना होगी कि किताब 'धूप में नंगे पांव' उतनी रोचक नहीं बनी है। किताब के कुछ हिस्से ही प्रभावित करते हैं। बृजेश अग्निहोत्री ने किताब पर अपनी संक्षिप्त टिप्पणी में कहा, 'धूप में नंगे पांव' यानी जिंदगी में नंगे पांव ! लेखक ने अपनी इस किताब में सामाजिक यथार्थ का विस्तृत वर्णन किया है। अग्निहोत्री ने भी अपेक्षित की बात से इत्तेफाक जताते हुए कहा, यह बात सच है कि पाठक पूरी किताब से बंध नहीं पाता। वहीं विजय भार्गव ने कहा, स्वयं प्रकाश ने अपनी आत्मकथा को आख्यान की तरह रोचक बनाकर पेश किया है। यह किताब, समाज और देशकाल पर व्यवस्थित लेखन है। ओमप्रकाश शर्मा ने कहा, देश में निजीकरण की किस तरह से शुरूआत हुई, किताब में इसका भी जिक्र मिलता है। स्वयं प्रकाश ने बड़े ही तटस्थता और ईमानदारी से उन स्थितियों का विवेचन किया है। जाहिद खान ने कहा अच्छी आत्मकथा वह होती है, जिसमें आपबीती से ज्यादा जगबीती हो। स्वयं प्रकाश ने इस किताब में अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण हिस्से के साथ-साथ तमिलनाडु, ओडिशा और राजस्थान जहां उन्होंने नौकरी की, वहां की संस्कृति और रहन-सहन का सूक्षमता से विवेचन किया है। त्रिलोचन जोशी ने कहा, स्वयं प्रकाश संवेदनशील लेखक हैं। किताब में कई जगह उनकी सूक्ष्म दृष्टि दिखलाई देती है। किताब के उपसंहार में उन्होंने बड़ी सार्थक टिप्पणी की है। लोकेश सोनी ने कहा, हिन्दी भाषियों को अहिन्दी भाषी क्षेत्र में जो व्यावहारिक कठिनाइयां आती हैं, लेखक ने किताब में उसका बखूबी वर्णन किया है। डॉ.पुनीत कुमार ने कहा 'धूप में नंगे पांव', जीवन के संघर्ष की गाथा है। जिंदगी की चुनौतियों का विश्लेषण और इसका समाधान, लेखक ने किताब में अपनी ओर से दोनों ही प्रस्तुत किया है। प्रकाश सेठ और भगवान सिंह यादव ने भी किताब पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी की।

2 कैप्शन : किताब 'धूप में नंगे पांव' पर समीक्षा करते हुए लेखक।

Posted By: Nai Dunia News Network

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