शिवपुरी (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

जिले का युवा वर्ग नशे की गिरफ्त में आ रहा है। हर महीने जिले में करोड़ों रुपये की स्मैक खपाई जा रही है। इसके अलावा दवाओं और गांजे आदि के सेवन की लत भी युवाओं को घेर रही है। शहर में स्मैक के नशे को युवा 'टिकिट' बोलते हैं और लंबे समय तक यह कोडवर्ड स्मैक खरीदने-बेचने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। नशे की यह लत उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर करने के साथ अब जान भी ले रही है। पिछले दो महीनों में ही जिले में तमाम ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मौत की वजह नशा बना है। एक दिन पहले ही फिजिकल थाना क्षेत्र में नशे के ओवरडोज ने एक युवक की जान ले ली थी। इसी तरह कुछ दिन पूर्व बैराड़ में एक युवक ने अपनी जान गंवा दी थी। इस तरह के कई और भी उदाहरण हैं। एक ओर युवा जान गंवा रहे हैं तो दूसरी ओर जिले में नशे का कारोबार तेजी से फलफूल रहा है। यहां हर महीनों करोड़ों की स्मैक ही खपाई जा रही है। इस बात को खुद पुलिस की कार्रवाई प्रमाणित करती है। कुछ समय पहले जब पुलिस ने स्मैक के खिलाफ अभियान चलाया था तो एक महीने अंदर ही पुलिस ने 30 लाख से अधिक की स्मैक बरामद की थी। इसके बाद पुलिस ने शहर को नशामुक्त मान लिया और अब यह कारोबार सिर उठा रहा है। यदि आंकड़ों की मानें तो सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही 30 हजार से अधिक युवा नशे की गिरफ्त में हैं। वहीं प्रशासन ने नशे की रोकथाम के नाम पर कथापथक दल के कार्यक्रम ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में आयोजित किए। इसमें दल के सदस्य चुनिंदा सीमित लोगों को कुछ बातें समझाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेते हैं।

शराब से लेकर एलएसडी जैसे नशे के आदी भी शहर में

युवाओं के समूह द्वारा शहर में किए गए सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। शहर के 39 वार्डों में नशे की गिरफ्त में रह चुके या फिर काम से जुड़े लोगों से जानकारी जुटाई गई। इसमें सामने आया कि करीब 11 हजार युवतियां किसी न किसी रूप में नशा करती हैं। सर्वे के अनुसार करीब 8 हजार युवा शराब, 2 हजार इंजेक्शन, एक हजार फालइ के जरिए कोकीन व स्मैक, 300 स्लोचन, 4 हजार गांजा, 150 अफीम का सेवन करते हैं। 50 लोगों के एलएसडी जैसे महंगे नशे का भी शिकार हैं।

नशामुक्ति केंद्र सिर्फ निजी, आज तक नहीं बन पाया सरकारी सेंटर

नशे से पीडित युवाओं के लिए जिला अस्पताल में पुनर्वास केंद्र बनाया गया है, लेकिन यहां पर व्यवस्थाओं के नाम पर कुछ है नहीं। एक चिकित्सक हैं और पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। पुलिस जिन नशेडियों को पकड़ती उनमें से कई को यहां भेजती हैं, लेकिन यहां प्राथमिक उपचार कर उन्हें एक-दो दिन में वापस भेज दिया जाता है। इसके बाद फिर से नशे के दलदल में उतर जाते हैं। इसके अलावा विकल्प सिर्फ दो निजी नशामुक्ति केंद्र हैं। यहां पर मरीज को भर्ती करने का खर्चा 15 हजार रुपये प्रतिमाह तक आता है। जो युवा नशे की गिरफ्त में आते हैं वे निम्न आय वर्ग के होते हैं और उनके स्वजन इतनी राशि का वहन करने में सक्षम नहीं होते हैं। दूसरा इन नशा मुक्ति केंद्रों पर प्रशासन नियंत्रण बहुत सीमित होता है।

नशे की लत दे रही एड्स की लाइलाज बीमारी

युवाओं में फैली नशे की लत न सिर्फ उन्हें कमजोर और अपराधी बना रही है, बल्कि एड्स जैसी लाइलाज बीमारी भी दे रही है। युवा नशे के लिए अब इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। एक ही सीरींज का बार-बार और कई लोगों द्वारा इस्तेमाल करने के कारण एड्स हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के अनुसार जिले में एड्स के 557 मरीज चिन्हित हुए हैं। इनमें से सीरींज के कारण एड्स का शिकार होने वालों की संख्या 55 हैं। यानी हर 10वां मरीज इंजेक्शन से नशे के कारण एड्स का शिकार हुआ है। फतेहपुर इलाके में एक लड़की एचआइवी पॉजिटिव हुई थी। उसके साथ नशा करने वाले तीन अन्य युवा भी एचआइवी पाजिटिव हो गए थे।

नशा बढ़ाने के लिए खून को करते हैं पंप, यह साबित होता है घातक

नशामुक्ति केंद्रों पर जो युवा नशे की लत छुड़ाने आते हैं उनमें कई तो इस लत के कारण गंभीर रूप से घायल हो चुके होते हैं। युवा एक बार इंजेक्शन से नशा करने के बाद इसे बढ़ाने के लिए बॉडी को इंजेक्शन से पंप करते हैं। इसमें वे इंजेक्शन से अपने शरीर का खून निकालते हैं और फिर से खून भरते हैं। नशे की हालत में होने के कारण कई बार इंजेक्शन गलत जगह लग जाता है। ऐसे में उनके शरीर पर कई गंभीर घाव बन जाते हैं। नशामुक्ति केंद्र पर आने वाले नशेड़ियों में अब यह समस्या काफी मात्रा में देखने को मिल रही है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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