उज्जैन। महाकाल मंदिर की व्यवस्था, सौंदर्यीकरण व विकास को लेकर शनिवार को भोपाल में हुई बैठक में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 300 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों को हरी झंडी दे दी। सूत्र बताते हैं कि बैठक में मंदिर में वीआईपी परंपरा, गर्भगृह में प्रवेश तथा स्थाई प्रशासक की नियुक्ति को लेकर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने बैठक में कहा कि गर्भगृह में वीआईपी की संख्या को समिति करें तथा आम भक्तों को सुविधा से दर्शन कराएं। मंदिर में स्थाई प्रशासक की नियुक्ति तथा गर्भगृह में प्रवेश बंद करने का निर्णय मंत्रियों की समिति द्वारा दिए गए सुझाव के बाद होगा।

महाकाल मंदिर में आम दर्शनार्थियों की जमकर फजीहत हो रही है। वीआईपी व रसूखदार मंदिर के विभिन्न द्वारों से प्रवेश कर रहे हैं। स्थाई प्रशासक नहीं होने से व्यवस्था लचर है। श्रावण मास में पूरे महीने मंदिर में अव्यवस्था और आए दिन विवाद की स्थिति बनी। देश-विदेश से आने वाले दर्शनार्थी परेशान होते रहे। भस्म आरती दर्शन अनुमति के लिए भी आम श्रद्धालु भटकते रहे। नागपंचमी पर सामान्य दर्शनार्थियों को अनुमति फार्म ही नहीं बांटे गए। इसकी जानकारी भोपाल तक पहुंची। शनिवार को बैठक में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि आम दर्शनार्थी के लिए सुलभ दर्शन व्यवस्था का प्लान बनाए। आम भक्तों को बिना किसी परेशानी के भगवान महाकाल के दर्शन होना चाहिए। बताया जाता है गर्भगृह में प्रवेश को लेकर सरकार गंभीर है। जल्द ही इस मामले में कोई बड़ा निर्णय हो सकता है। मंदिर की व्यवस्था में सुधार के लिए नए पदों का सृजन भी सरकार कर सकती है।

ऑनलाइन होगी भस्मारती व्यवस्था

भस्मारती अनुमति व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार प्रयासरत है। बताया जाता है व्यवस्था को पूरी परह ऑनलाइन किया जाएगा। भक्त मंदिर समिति की वेबसाइट व महाकाल एप के जरिए ऑनलाइन बुकिंग कर सकेंगे। यह व्यवस्था पारदर्शी होने के साथ सुरक्षा की दृष्टि से भी उपयुक्त रहेगी। ऑफलाइन व्यवस्था पर मंदिर समिति सालाना करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। ऑनलाइन होने से फिजूलखर्ची रुकेगी। यह राशि श्रद्घालुओं की सुविधा पर खर्च की जा सकेगी।

इन प्रकल्पों को बंद करने पर हो सकता है विचार

सूत्र बताते हैं सरकार मंदिर समिति द्वारा संचालित वैदिक प्रशिक्षण शोध संस्थान व विक्रमकीर्ति मंदिर जैसे प्रकल्पों को बंद करने पर विचार कर सकती है। जिन उद्देश्यों को लेकर तात्कालिक अधिकारियों ने इन्हें शुरू किया था, यह उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं। इनके संचालन में सालाना करोड़ों रुपए का व्यय हो रहा है।

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