Lockdown in Ujjain : धीरज गोमे, उज्जैन। दाल-बाटी या फिर दाल-बाफले...। जब तक न बने, तब तक भूखा-भूखासा रहता है मालवा-निमाड़। सूनी-सूनी सी रहती है रसोई। इसके बिना रसहीन से लगते हैं शादी-ब्याह, तीज-त्योहार। अब देखिए न इसके बिना लॉकडाउन भी अधूरा है। उज्जैन वायरस के संक्रमण से बचने के लिए घरों में कैद है और छककर दाल-बाटी/दाल बाफले के मजे ले रहा है। महाकाल, काल भैरव परिसर और होटल-ढाबे तक नहीं पहुंच पा रहा है तो घर में ही हर दूसरे दिन इसे छककर खा रहा है। इसके स्वाद का असली मजा कंडे पर सिकने में है, इसलिए कंडों की होम डिलीवरी भी शुरू हो गई है। मांग बढ़े तो भला कीमत कैसे न बढ़े! अमूमन 10 रुपये में मिलने वाला एक कंडा 30 रुपये तक का हो गया है। शहर के जयसिंहपुरा और भैरवगढ़ इलाके के ग्रामीण परिवार कंडों का व्यापार करते हैं।

आम दिनों में शहरवासी इन स्थानों पर पहुंचकर कंडे खरीदते हैं, मगर लॉकडाउन के बाद स्थिति अलग है। शहर के लोग ग्रामीणों को फोन कर कंडे घर पहुंचाने की गुजारिश कर रहे हैं। ग्रामीण भी ठेले पर कंडे रख होम डिलीवरी कर रहे हैं। रास्ते में भी इन कंडों के खूब खरीददार मिल रहे हैं। खास बात यह है कि इन्हें रास्ते में कोई रोकताटोकता भी नहीं है।

सुबह निकलते हैं, दोपहर तक सब बिक जाते : जयसिंहपुरा निवासी रमेश बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद से ही शहर के लोगों के फोन उनके पास आ रहे हैं। ऐसे में उनके घर तक कंडे पहुंचा रहे हैं। ठेले पर कंडे ले जाते हैं तो रास्ते में भी इनके खरीददार मिल जाते हैं। अधिकांश लोग बाटी या बाफले सेकने के लिए इन्हें खरीदते हैं।

यह भी जानें

- 1,02, 041 परिवार हैं शहर में।

- 20 से अधिक छोटी-बड़ी गोशालाएं शहर में।

- 140 गांवों से भी शहर में आते हैं कंडे।

- 22030 गायें और 38 हजार से अधिक भैंसें उज्जैन जनपद में।

- 30 हजार से अधिक कंडों की खपत रोज हो रही है।

- घरों से मांग बढ़ने और होम डिलीवरी के कारण बढ़ी कीमत।

शहर में 25 से अधिक दुकानें, पर्यटक भी स्वाद के मुरीद

उज्जैन में रोजाना सैकड़ों पर्यटक बाहर से दर्शन आदि के लिए शहर आते हैं। इसमें देशभर के पर्यटक शामिल हैं। बाहर से आने वाले पर्यटक अथवा श्रद्धालुओं को भी मालवा का दाल-बाटी/दाल बाफला खूब पसंद है। शहर में धार्मिक स्थलों के आसपास ही 25 से अधिक भोजनालय ऐसे हैं, जहां रोजाना ये व्यंजन तैयार होता है। इसमें से कुछ भोजनालय काफी प्रसिद्ध हैं। ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर के समीप भोजनालय चलाने वाले अनिल गंगवाल बताते हैं कि महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश सहित कई स्थानों से आने वाले श्रद्धालु भोजनालय में आते ही बिना मीनू देखे दाल-बाफला या बाटी मांगते हैं। मालवा के इस व्यंजन की मांग लगातार बढ़ी है।

Posted By: Prashant Pandey

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

जीतेगा भारत हारेगा कोरोना
जीतेगा भारत हारेगा कोरोना