धीरज गोमे, उज्जैन। बात देवभाषा संस्कृत की हो तो मध्यप्रदेश की धर्मधानी उज्जैन का नाम आना लाजिमी है। क्योंकि युगों-युगों से उज्जैन, संस्कृत का उत्कृष्ट अध्ययन केंद्र रहा है। यहां भगवान श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण किया। कालिदास ने कई ग्रंथ रचे।

आधुनिक युग की डॉ. केशवराव सदाशिवशास्त्री मूसलगांवकर जैसी हस्तियां पली-बढ़ीं, जिन्होंने संस्कृत भाषा को आत्मसात किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार, पद्मश्री, महामहोपाध्याय की उपाधियां पाई। इन दिनों देवभाषा की विरासत पाणिनी संस्कृत विवि आगे बढ़ा रहा है। यहां छात्र से लेकर शिक्षक यहां तक कि ड्राइवर भी संस्कृत में बात करते हैं।

संस्कृत दिवस (15 अगस्त) से एक दिन पहले 'नईदुनिया" ने इस भाषा की महत्ता, आवश्यकता और इसमें रोजगार की संभावनाओं को लेकर महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के विद्वानों तथा विद्यार्थियों खुलकर चर्चा की।

प्राध्यापक डॉ. तुलसीदास परोहा ने बताया कि 17 अगस्त 2008 को स्थापित इस विश्वविद्यालय से अब तक 6 हजार से ज्यादा विद्यार्थी डिग्री और डिप्लोमा लेकर निकल चुके हैं। कई थल सेना में धर्म गुरु, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

हाल ही में छात्रा मिनाक्षी सिंह का चयन मप्र लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा के माध्यम से हुआ है। थल सेना में धर्म गुरु के रूप में विनोद पंड्या और जगदीश शर्मा का चयन हुआ है। यहां स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए 200 सीटे हैं, जिनमें से इस साल सभी भरा गई हैं।

परेशानी यह है कि इन्हें पढ़ाने के लिए पिछले कई सालों से स्थायी प्राध्यापकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। वर्तमान में 7 स्थायी और 16 अस्थायी प्राध्यापक हैं। डॉ. तुलसीदास के अनुसार यहां कुलसचिव की गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर हर्षवर्द्धन परोहा भी संस्कृत में वार्तालाप करता है। पूरे विश्वविद्यालय में अमूमन विद्यार्थी और समस्त प्राध्यापक संस्कृत में ही बातचीत करते हैं।

ड्राइवर ने कहा- घर में बोलता तो पत्नी और मां भी बोलना सीख गईं

संस्कृत विश्वविद्यालय में पदस्थ ड्राइवर हर्षवर्द्धन परोहा ने बताया कि 15 साल पहले संस्कृत भारती के एक कार्यक्रम में शामिल हुआ था। तब 20 दिन के प्रशिक्षण के बाद संस्कृत बोलना सीख लिया। नियमित अभ्यास से और आसानी हो गई। घर में भी संस्कृत में वार्तालाप शरू किया। अब स्थिति यह है कि मां और पत्नी, हम सब संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं।

संस्कृत के इन विद्वानों ने बढ़ाया उज्जैन का मान

- प्रकांड विद्वान स्व. गोपीकृष्ण शास्त्री

- राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पद्मश्री स्व. प्रोफेसर वी. वेंकटाचलम

- राष्ट्रपति पुरस्कार एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त आचार्य स्व. बच्चूलाल अवस्थी

- राष्ट्रपति पुरस्कार एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त स्व. श्रीनिवास रथ

- राष्ट्रीय संस्कृत विद्वापीठ की ओर से महामहोपाध्याय की उपाधि प्राप्त पद्मश्री डॉ. केशवराव शास्त्री मूसलगांवकर

- विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा

- राष्ट्रपति पुरस्कार प्रापत डॉ. केदारनारायण जोशी

- पूर्व संभागायुक्त एवं महर्षि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति डॉ. मोहन गुप्त

- शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संस्कृत विभाग की रिटायर्ड एचओडी प्रो. अजीता त्रिवेदी

उज्जैन में पहली बार होगी श्लाका परीक्षा

संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए देश में ख्यात संस्था संस्कृत भारती पहली बार उज्जैन में श्लाका परीक्षा कराने जा रही है। ये परीक्षा अक्टूबर में प्रस्तावित है, जिसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से कई विद्यार्थियों के शामिल होने का दावा किया गया है।

संस्था के प्रांत उपाध्यक्ष भरत बैरागी ने बताया ये एक ऐसी प्राचीन पद्धति से ली जाने वाली परीक्षा है, जिसमें परीक्षक एक ग्रंथ में कहीं भी पेन रखकर पन्ना खुलवाकर परीक्षार्थी से कंठस्थ परायण कराएंगे। उसका व्याख्यान भी कराया जाएगा। परीक्षक को जो पढ़ा है उससे संबंधित प्रश्न पूछने का अधिकार भी होगा। सर्वाधिक अच्छा परिणाम देने वाले 12 परीक्षार्थियों को नकद पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

इनके पूरे परिवार में संस्कृतविद्, 11 लोगों ने की पीएचडी

डॉ. केशवराव सदाशिव शास्त्री मूसलगांवर का परिवार संस्कृतविद् परिवार के लिए जाना जाता है। इनके पूरे परिवार के सभी सदस्य संस्कृत के विद्वान हैं। 11 सदस्यों ने पीएचडी की उपाधी प्राप्त की है।