उज्जैन। मगरमुहा की गली में पं.शुक्ला के मकान में विधाता माता का अतिप्राचीन मंदिर स्थित है। करीब 1500 साल पुराने इस मंदिर में देवी की स्वयंभू मूर्ति खड़ी अवस्था में विराजित है। देवी के एक हाथ में कलम तथा दूसरे हाथ में कपाल है, इस पर देवी भाग्य लिखते हुए दृश्य होती है। देव का विधाता माता का पौराणिक नाम विद्यात्तय देवी है। इन्हें सृष्टि देवी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है विधाता माता जन्म के छठवें दिन बच्चों के भाग्य लिखती हैं। इसी मान्यता के चलते दूरदराज से भक्त बच्चों को माता के दरबार में लेकर आते हैं। खासकर नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन को पहुंचते हैं। इस मंदिर के बारे में शहर के लोग ही जानते हैं।

प्रसिद्धि : विधाता माता का उल्लेख देवी भागवत, दुर्गा सप्तशती और अवंतिका पुराण में मिलता है। यह मूर्ति मौर्यवंश के पूर्वकाल की है। माता का पूजन खासकर नवरात्रि के छठवें दिन किया जाता है। माता का चमेली के तेल, चांदी के वर्क से श्रृंगार किया जाता है और उनके सिर पर हिंग्लू लगाया जाता है। भक्त शिशु के जन्म बाद और नवरात्रि में पूजन के दौरान माता के चरणों में हार-फूल के साथ कलम, दवात और कापी चढ़ाते हैं। माता को चुनरी नहीं ओढ़ाई जाती है, उनकी मूर्ति पर प्राकृतिक वस्त्र की आकृति बनी हुई है।

खास बात : पुजारी के अनुसार उनके पूर्वज गुजरात से आकर उज्जैन में बस गए थे। मगरमुहा के जिस घर में आज वे रहते हैं, यही उनके पूर्वज रहा करते थे। एक दिन स्वप्न में उन्हें माता ने दर्शन दिए और इस स्थान पर मूर्ति होने का संकेत दिया। इसके बाद यहां खुदाई की गई, गहरी खुदाई के बाद विधाता माता की मूर्ति निकली। मूर्ति को उसी स्थान पर विराजित किया गया, जो आज भी यहां मौजूद है।

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