उज्जैन से धीरज गोमे। भारत आस्थावान लोगों का देश हैं। यहां मान्य कई आस्थाओं में एक है पवित्र नदियों में स्नान। भारत की पवित्रतम और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण शिप्रा नदी का दूषित और गंदा पानी श्रद्धालुओं को निराश कर रहा है। ज्यादातर मौकों पर नदी में पानी कीचड़युक्त या गंदगी से भरा होता है। जो इसमें जाने की हिम्मत नहीं कर पाते उन श्रद्धालुओं को नदी की बजाए फव्वारों के पानी से स्नान कर अपनी आस्था को आधे-अधूरे ढंग से पूरा करना पड़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 10 से 12 लाख लोग विभिन्न् पर्व स्नान पर शिप्रा में स्नान (नहान) करने आते हैं। वहीं, 12 साल में एक बार यहां लगने वाले महाकुंभ सिंहस्थ के दौरान 4 से 5 करोड़ लोग नहान के लिए आते हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं की उमड़ती आस्था को डुबकी लगाने योग्य पानी न मिल पाने की समस्या करीब दो दशक से चली आ रही है।

इसके लिए नर्मदा जैसी नदी से पानी लाने की व्यवस्था भी हुई लेकिन मध्य प्रदेश की धर्मधानी उज्जैन की मोक्षदायिनी शिप्रा नदी में फिलहाल दूषित पानी या पानी की कमी की समस्या बरकरार है। बीते गुरुवार को पूर्णिमा पर मैले पानी में श्रद्धालुओं को डुबकी लगाना पड़ी। इसके बाद भाजपा ने राज्य की कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रदेश शासन ने पूर्व की योजनाओं का बंटाधार कर दिया है। वहीं कांग्रेस ने पलटवार कर कहा है कि भाजपा विधायक खुद पिछली सरकार की नर्मदाशिप्रा लिंक योजना पर सवाल उठा चुके हैं।

सियासत के बीच शिप्रा नदी एक प्रश्न उठा रही है- आखिर मुझे गंदगी से मोक्ष कब मिलेगा। बड़ा सवाल यह भी है कि 'सरकारें' भी इस समस्या का हल नहीं निकाल पा रहीं। इंदौर जिले के जानापाव की पहाड़ियों से निकलने वाली शिप्रा करीब 196 किमी तक बहती है। हालांकि यह कभी सदानीरा नहीं रही लेकिन इसमें गंदे पानी की भी समस्या विकराल भी नहीं रही। शिप्रा नदी का पानी वर्तमान में उज्जैन में मुख्य रूप से दो स्थानों पर दूषित हो रहा है। एक, त्रिवेणी के पास खान नदी का गंदा पानी मिलने से और दूसरा, मंगलनाथ मंदिर के पीछे बह रहा नाला मिलने से। इसके अलावा छोटे-छोटे कई ऐसे नाले-नालियां, चैंबर भी हैं, जिनमें उफान आने पर सीधे गंदा पानी शिप्रा में जा मिलता है।

इन कारणों से है शिप्रा 'मैली' : शिप्रा शुद्धिकरण के लिए अब तक कई परियोजनाएं लागू की जा चुकी हैं। चिंताजनक यह है कि अब तक जितनी भी प्रोजेक्ट लागू हुए, उनकी ठीक से मॉनिटरिंग नहीं की गई। दरअसल सरकारी तंत्र ने इसमें रुचि ही नहीं दिखाई। ताजा दो उदाहरण सामने आए हैं। पहलाखान डायवर्शन प्रोजेक्ट की सीवरेज पाइपलाइन लीकेज होना। दूसरा-इंदौर का सीवरेज और फैक्ट्रियों का प्रदूषित जल बिना उपचारित शिप्रा में मिलने के लिए छोड़ दिया जाना। दोनों ही मामलों में मॉनिटरिंग और दूरदर्शिता की कमी है। 19 नवंबर से इंदौर के कुछ सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के पंप बंद थे, प्लांट पूर्ण क्षमता से नहीं चलाए जा रहे थे। खान डायवर्जन पाइपलाइन भविष्य में क्षतिग्रस्त होगी तो उसकी मरम्मत के लिए क्या वैकल्पिक तकनीक इस्तेमाल की जाएगी, इस पर काम ही नहीं किया गया। मेंटेनेंस के लिए जल संसाधन विभाग को बजट भी स्वीकृत नहीं किया गया। वर्तमान में पंप अब पूर्ण क्षमता से चलाने की बात इंदौर स्मार्ट सिटी कंपनी ने कही है। इधर जल संसाधन विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर टीआर परमार ने कहा है कि पाइपपलाइन लीकेज सुधारने में सप्ताहभर का समय और लगेगा। खान का पानी भी डायवर्ट होने लगेगा। ऐसे में खान का पानी शिप्रा में त्रिवेणी से मिलना बंद हो जाएगा।

बारिश में खान नदी का पानी मिलेगा ही : जल संसाधन विभाग का कहना है कि 96 करोड़ रुपए की खान डायवर्जन योजना वर्षाकाल के लिए नहीं है। बारिश में खान का पानी शिप्रा में सीधे मिलेगा ही। ये योजना सिर्फ वर्षाकाल गुजरने के बाद के खान के पानी को त्रिवेणी से सिद्धवट तक शिप्रा में मिलने से रोकने के लिए है। मगर हकीकत उलट है। जब से योजना बनी है, उसके बाद ऐसे कई अवसर आए हैं जब ठंड और गर्मी में भी खान का गंदा पानी शिप्रा में मिला। वर्तमान में भी यही हाल है।

भाजपा विधायक ने नर्मदा-लिंक परियोजना को बताया था फेल : भाजपा के तत्कालीन विधायक डॉ. मोहन यादव ने साल 2017 में नर्मदा-शिप्रा लिंक योजना को विफल करार दिया था। विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को भेजे एक पत्र के माध्यम से कहा था कि 432 करोड़ रुपए की नर्मदा-शिप्रा लिंक योजना विफल है। शिप्रा को सदानीरा और स्वच्छ बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए, मगर यह अब भी मैली है। अब विधायक पारस जैन ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाने की बात कही है।

शिप्रा में नर्मदा का पानी छोड़ा मगर बिल के 220 करोड़ नहीं चुकाए : शिप्रा नदी में नर्मदा का पानी छोड़ने के एवज में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने उज्जैन नगर निगम को 220 करोड़ 84 लाख रुपए का बिल मार्च, 2019 में भेजा था, जो अब तक नहीं भरा गया है। बिल 22 रुपए 60 पैसे प्रति घनमीटर जल की दर से उज्जैन को 1 फरवरी 2014 से 31 जनवरी 2019 तक मुहैया कराए 97.72 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का था। किसी सरकारी एजेंसी को दिया यह बिल अब तक के इतिहास में संभवत: सबसे भारीभरकम माना गया था। पूर्व निगम आयुक्त प्रतिभा पाल ने बिल माफी के लिए शासन को पत्र भेजा था मगर उसका कोई जवाब नहीं आया।

धार्मिक रूप से इतनी महत्वपूर्ण है शिप्रा

शिप्रा नदी की उत्पत्ति के संबंध में पौराणिक कथा है कि पुरातन काल में ऋषि अत्रि ने अवंतिकापुरी में हजारों वर्षों तक घोर तप किया था। तप पूरा होने पर जब उन्होंने आंखें खोलीं तो पाया कि उनके तन से दो जलधाराएं बह रही है। इनमें से एक जलधारा ने अंतरिक्ष में जाकर चंद्रमा का रूप लिया और दूसरी जलधारा भूमि की ओर बह गई। इसी जलधारा का शिप्रा नदी के रूप में उद्गम हुआ। शिप्रा नदी को मोक्ष देने वाली यानी जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त करने वाली माना गया है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अपने पिता का तर्पण यहीं किया था।

चुनाव में शिप्रा बनी थी मुद्दा

विधानसभा चुनाव-2018 में पहली बार नर्मदा, शिप्रा और खान नदी चुनावी मुद्दा बनी थी। तब भाजपा ने नर्मदा-शिप्रा के संगम और इससे जुड़ी योजनाओं को भुनाने की कोशिश की थी। वहीं कांग्रेस ने योजनाओं को फेल बताया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी एक चुनावी सभी में शिप्रा का गंदा पानी बोतल में दिखाते हुए कहा था- 400 करोड़ रुपए से सरकार ने शिप्रा के पानी को ऐसे साफ किया है। कांग्रेस-भाजपा दोनों ने अपनेअपने घोषणा पत्र में शिप्रा नदी के लिए काम करने की बात कही थी। सरकार तो बदली मगर शिप्रा की समस्या जस की तस है।

Posted By: Prashant Pandey

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