उज्जैन। (नईदुनिया प्रतिनिधि)। देवासगेट स्थित शासकीय कालिदास कन्या कॉलेज में गुर्स्वार दोपहर विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अखिलेशकुमार पांडेय संग छात्राओं की चाय पर चर्चा हुई। इसमें छात्रा पूजा रायकवार ने कुलपति से सवाल किया कि 'स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय फीस के बदले कचरा क्यों नहीं लेते। ये शैक्षणिक संस्थाएं अपने पोषण के लिए आय का तरीका क्यों नहीं बदलती।' कुलपति ने जवाब दिया कि यह भी एक दिन अवश्य होगा। जब विद्यार्थी लर्निंग संग अर्निंग सिद्धांत पर काम कर संस्थान संचालन में मदद करेंगे। फिलहाल विश्वविद्यालय कचरा प्रबंधन की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाने जा रहा है। बॉटनी डिपार्टमेंट में गीला और सूखा कचरा एकत्र करने को पिट बनाए गए हैं। विद्यार्थी यहां पॉलीथिन में पैक कचरा लाकर दे सकते हैं। विश्वविद्यालय, गीले कचरे से जैविक खाद बनाएगा, प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल पक्की सड़के बनवाने में करेगा। इस संबंध में एक बड़ा जागरूकता कार्यक्रम जल्द शुरू होगा। कचरा प्रबंधन नामक पाठ्यक्रम भी शुरू करेंगे, जिसमें वेस्ट से बेस्ट बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

मालूम हो कि असम का एक स्कूल इस प्रकार की पहल बीते वर्ष कर चुका है। नाम अक्षर फाउंडेशन स्कूल हैं, जिसने फीस के बदले अनुपयोगी प्लास्टिक लेना शुरू किया था। इस प्रकार की फीस से स्थानीय पर्यावरण सुधार में मदद मिली।

हर वर्ष 80 हजार टन कचरा उत्सर्जित

शहर से हर साल 80 हजार टन कचरा उत्सर्जित हो रहा है। इसके डोर टू डोर संग्रहण और परिवहन पर हर साल 15 करोड़ र्स्पये से ज्यादा खर्च हो रहे हैं। मिशन 4-आर अंतर्गत कचरे को रीड्यूज, रीफ्यूज, रीयूज और रिसाइकिल करने के लिए भी करोड़ों र्स्पये खर्च किए जा रहे हैं। उज्जैन नगर निगम विभिन्ना्‌ संस्थाओं को कारखाना खोलने को जमीन उपलब्ध कराकर गीले कचरे से खाद-बिजली, पुराने कपड़ों-कागज, अनुपयोगी फूलों से अगरबत्ती, प्लास्टिक से गमले एवं सुंदर कलाकृतियां बनवा रही है। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। उज्जैन शहर में कचरे की कीमत 1950 र्स्पये टन है।

छात्राओं ने यह प्रश्न भी किए

- क्या ठंडे प्रदेशों में बहुतायत में रोपे जाने वाले पौधे, गर्म प्रदेशों में रोपे जा सकते हैं। जवाब मिला- बिल्कुल। पॉलीहाउस फार्मिंग इसी का उदाहरण है।

- क्या हर गोमूत्र फायदेमंद है। जवाब मिला- नहीं। सिर्फ देसी गाय का। क्योंकि इसमें टॉक्सीन नहीं होता। यही वजह है कि देसी गाय का दूध, घी भी महंगा होता है।

'कक्ष से वृक्ष तक' अभियान की शुरुआत, अब खेत-बगीचों में लगेगी क्लास

चाय पर चर्चा उपरांत कुलपति ने कालिदास कन्या कॉलेज में 'कक्ष से वृक्ष तक' अभियान की शुरुआत की। प्राचार्य डॉ. महेश शर्मा और प्राध्यापक डॉ. हरीश व्यास ने बताया कि कौशल विकास के लिए अब वनस्पति शास्त्र विभाग के विद्यार्थियों की क्लास सीधे प्रकृति के बीच खेतों, बगीचों में लगा करेंगी। विद्यार्थी प्रत्यक्ष रूप से पौधे रोपना, उनमें हो रहे बदलाव को देख-मसझ एवं महसूस कर पाएंगे। कुलपति ने विद्यार्थियों से कहा कि प्रकृति के बीच जाकर शोध करेंगे तो ही परिणाम ठीक आएंगे। बंद वातानुकूलित कक्ष में बैठकर शोध करने से नहीं। सोच को उम्दा करें। महज डिग्री लेने को पढ़ाई न करें। स्किल बढ़ाने पर ध्यान दें। आत्मनिर्भर होने का मतलब रोजगार का सृजन करना है। सिर्फ सरकारी नौकरी पाना नहीं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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