उमरिया से संजय कुमार शर्मा। बाघों के साम्राज्य बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में स्थित किले में एक मंदिर अनूठे विरोधाभास का प्रतीक है। हर साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर यहां केवल एक दिन का मेला लगता है और लोग श्रीराम-जानकी के दर्शन करने पहुंचते हैं। नेशनल पार्क के ताला गेट से बांधवगढ़ किले तक का 15 किमी का सफर लोगों को पैदल तय करना होता है। फिर दर्शन के बाद बिना रुके वापसी करनी होती है।

इस मेले में लगभग 15 हजार लोग हर साल शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं को ताला गेट पर पंजीयन भी कराना जरूरी होता है। वापसी में उनके लौटने का भी हिसाब रखा जाता है। मेले में जाने वालों को सुबह छह बजे से 11 बजे तक ही प्रवेश दिया जाता है। श्रद्धालुओं को शाम पांच बजे तक वापस लौटना होता है।

साल में एक बार खुलता है श्रीराम-जानकी मंदिर : किले में बने श्रीराम-जानकी को साल में सिर्फ एक बार आम भक्तों के लिए खोला जाता है। सुबह से ही यहां पूजन का कार्यक्रम शुरू हो जाता है और जंगल के खतरे को देखते हुए दोपहर बाद मंदिर खाली करा लिया जाता है। किले की सीमा में ही भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्रतिमाएं पत्थरों को तराशकर बनाई गई हैं। इनमें कच्छप स्वरूप और शेष शैया पर आराम की मुद्रा में भी भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं।

पहरे में होते हैं दर्शन : लगभग 125 बाघों वाले बांधवगढ़ के जंगल में पैदल यात्रा खतरे से खाली नहीं होती। यही कारण है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पूरे रास्ते में सख्त पहरा होता है। पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों के अलावा सुरक्षा श्रमिक यहां तैनात किए जाते हैं। हाथियों से गश्त की जाती है और जिप्सियों से भी पहरा दिया जाता है।

महाराजा मार्तंड सिंह ने रखी थी शर्त : कभी बघेल शासकों की शिकारगाह रहा बांधवगढ़ का जंगल जब टाइगर रिजर्व बनाने के लिए सौंपा गया, तब महाराजा मार्तंड सिंह ने सरकार के सामने शर्त रखी थी कि किले में लगने वाले मेले की परंपरा को खत्म नहीं किया जाएगा और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं को यहां आने से नहीं रोका जाएगा। यही कारण है कि हर साल एक दिन के लिए यहां वन्यजीव एक्ट भी शिथिल हो जाता है।

इतिहास और किंवदंती : बांधवगढ़ का नाम यहां मौजूद एक पहाड़ के नाम पर ही रखा गया है।इस पर एक ऐसा किला है जिसका निर्माण करीब दो हजार वर्ष पहले कराया गया था। किंवदंती है कि यह किला भगवान राम ने लक्ष्मण को भेंटस्वरूप प्रदान किया था, इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला है।

अजेय है किला

इस किले का इतिहास टीपू सुल्तान से जुड़ा होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि 6 माह के लगातार प्रयास के बाद भी वह इस खुफिया किले पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था। यहां अंदर सात ऐसे तालाब हैं जो अब तक सूखे नहीं हैं। अब यहां की देखरेख शासन द्वारा की जाती है।