उमरिया, नईदुनिया प्रतिनिधि Durga Ashtami 2020। शारदीय नवरात्र की अष्टमी पर विरासिनी के दरबार में अठवाईं चढ़ा कर माता की पूजा अर्चना की गई। मान्यता है कि अष्टमी को अठवाईं चढ़ाने से माता विशेष भोग के रूप में इसे ग्रहण करतीं है और मनोवांछित फल की प्राप्ति कराती हैं। अष्टमी पर ही मां का विशेष श्रृंगार भी किया गया। माता विरासनी के दरबार में विशेष आरती का आयोजन किया गया। कोरोना संक्रमण को देखते हुए इस बार सभी धार्मिक आयोजन सीमित किए गक्षए हैं। मंदिर प्रबंध समिति के अनुसार आरती में शामिल होने वालों की संख्या 50 से अधिक नहीं होती है।

उमरिया जिले के बिरसिंहपुर पाली नगर में विराजीं मां विरासनी अपने अलौकिक स्वरूप और तेज के लिए जानी जाती हैं। उनके दरबार मे मन शांति और विश्वास से भर उठता है। जो व्यक्ति एक बार भी मातेश्वरी के दर्शन प्राप्त कर लेता है, वह हमेशा के लिए स्वयं को उनके चरणों मे समर्पित कर देता है। वे वात्सल्य का प्रतीक हैं, जिनके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। मां बिरासिनी की शक्तियां जितनी चमत्कारिक हैं, उतनी ही रोचक है सिद्धिदात्री के उद्भव की कथा। कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व विरासिनी माता ने नगर के धौकल नामक एक व्यक्ति को सपने में आकर कहा कि उनकी मूर्ति एक खेत में है, जिसे लाकर स्थापित करो। इसके बाद धौकल ने प्रतिमा को खोद निकाला और छोटी सी मढ़िया में उन्हे स्थापित कर दिया। बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने एक मंदिर का निर्माण करा कर माता की स्थापना की।

एक हजार साल पुराना इतिहास

विरासिनी मंदिर मे विराजीं आदिशक्ति मां बिरासिनी की प्रतिमा कल्चुरी कालीन है। जानकार मानते हैं कि इसका निर्माण 10वीं सदी मे कराया गया था। काले पत्थर से निर्मित भव्य मूर्ति देश भर में महाकाली की उन गिनी चुनीं प्रतिमाओं मे से एक है जिसमें माता की जीभ बाहर नहीं है। मंदिर के गर्भ गृह मे माता के पास ही भगवान हरिहर विराजमान हैं जो आधे भगवान शिव और आधे भगवान विष्णु के रूप हैं । मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी, देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर परिसर में राधा, कृष्ण, मरही माता, भगवान् जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर हैं। जहां प्रवेश करते ही हृदय भक्ति भाव से ओतप्रोत हो उठता है।

1989 में शुरू हुआ मंदिर जीर्णोद्धार

कई वर्ष बाद 23 नवंबर 1989 को जगतगुरु शंकराचार्य शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती द्वारा विरासिनी मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ हुआ। स्थानीय नागरिकों, कालरी प्रबंधन और दानदाताओं के सहयोग से लगभग सत्ताईस लाख रूपये में माता का भव्य मंदिर बन कर तैयार हुआ। मंदिर का वास्तुचित्र वास्तुकार श्री विनायक हरिदास एनबीसीसी नई दिल्ली द्वारा निशुल्क प्रदान किया गया। विरासिनी मंदिर का लोकार्पण 22 अप्रैल 1999 को जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष से संपन्न हुआ।

Posted By: Prashant Pandey

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस