उमरिया (नईदुनिया प्रतिनिधि)। इस्लाम धर्म का मातमी पर्व मोहर्रम जिले भर में मनाया गया। इस मौके पर सैय्यदना उमरिया वाले बाबा हुजूर की सवारी इमामबाड़े से उठकर जामा मस्जिद पहुंची। बाबा हुजूर की मस्तानी चाल, शान ओ शौकत और मुराद के करिश्मे के कारण शहर का मोहर्रम प्रदेश भर में अपनी अलग पहचान रखता है। कोरोना महामारी के कारण पिछले दो साल तक यह आयोजन समिट गया था लेकिन इस बार यह मातमी पर्व हमेशा की तरह मनाया गया। इसके लिए मोहर्रम कमेटी द्वारा अपील जारी करके आवश्यक दिशा निर्देश पहले ही जारी कर दिए गए थे।

दोनो सम्प्रदायों की भागीदारी

यूं तो मातमी पर्व मोर्हरम इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगम्बर हजरत मो. के नवासे इमाम हुसैन के शहादत की याद में मनाया जाता है, परंतु उमरिया में यह मातमी पर्व पूरे देश के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। मोहर्रम से पहले इमामबाड़ा की सजावट हो, हुजूर की खिदमत में शेर बन कर नृत्य करना या फिर उनकी सवारी के साथ कदमताल कर मुकाम तक सफर करने की बात हो, हर किसी में नगर के हिन्दुओं की बराबर भागीदारी रहती है।

हिंदू बाबा को आती है सवारी

मोहर्रम पर हिंदू को सवारी आना कौम को यह साफ संदेश है कि ऊपर वाले के लिए हर इंसान बराबर है, वह मजहब में फर्क नहीं करता। हमारे पूर्वजों ने सैकड़ों साल पहले परमात्मा के उस संदेश को आत्मसात किया था। जानकार बताते हैं कि उमरिया वाले बाबा हुजूर की सवारी सन्‌ 1882 में पहली बार आमद हुई थी। तब हुजूर ने स्व. माधव सिंह जी को खिदमत का मौका दिया। यह दौर पूरे 40 साल तक चला। इस दौरान बाबा हुजूर ने कई करतब भी दिखाए। बाबा माधव सिंह जी के पर्दा करने के बाद बाबा फूल सिंह पर सैय्यदना उमरिया वाले बाबा हुजूर की सवारी आमद होती रही। बाबा फूल सिंह जी के पर्दा करने के बाद विगत 27 वषोर् से बाबा सुशील सिंह जी पर बाबा हुजूर की सवारी की तशरीफ आमद होती चली आ रही है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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