मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के किसान खुद की प्रसंस्करण इकाई लगाकर बाजार में उतरने को तैयार

अजय जैन, विदिशा। गांव के एक युवा किसान की छोटी सी पहल किस तरह पूरे गांव को आर्थिक रूप से समृद्ध और आत्मनिर्भर बना सकती है इसका उदाहरण है मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का गांव पाली, जहां का हर किसान औषधीय खेती करने लगा है। इस गांव में अब किसान खुद की प्रसंस्करण इकाई भी स्थापित कर रहे हैं। ताकि अपने ब्रांड से औषधि बनाकर कमाई को बढ़ा सकें।

पाली गांव में तीन सौ मध्यमवर्गीय किसान परिवार रहते हैं, जिनकी आय का जरिया खेती ही है। वर्ष 2014 में गांव के बीएससी पास युवा लखन पाठक ने डेढ़ एकड़ में अश्वगंधा की खेती की शुरुआत की थी, जिसमें उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ। इसके बाद उन्होंने अश्वगंधा का रकबा बढ़ाना शुरू किया।

उन्हें देखकर अन्य किसान भी छोटे- छोटे रकबे में अश्वगंधा की खेती करने लगे। दो साल पहले जब कोरोना महामारी फैली तो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर अचानक अश्वगंधा की मांग बढ़ी। जिससे यहां के किसानों को अच्छे दाम मिलने लगे, जो अश्वगंधा पहले 20 हजार रुपये क्विंटल बिकता था।

बीते साल किसानों को उसके दाम 40 हजार रुपये क्विंटल तक मिले। अच्छा मुनाफा मिलने से किसानों में औषधीय खेती की तरफ रुझान बढ़ा और उन्होंने अकरकरा व कलौंजी की खेती भी शुरू कर दी है। आठ साल में डेढ़ एकड़ से शुरू औषधीय खेती अब दो सौ एकड़ तक पहुंच गई है। इस गांव का हर किसान अब औषधीय खेती करने लगा है।

किसान प्राणसिंह धाकड़ और जसमन अहिरवार बताते है कि औषधीय खेती में प्राकृतिक प्रकोप से नुकसान का खतरा परंपरागत फसलों से बहुत कम रहता है। ओला और पाला से ज्यादा नुकसान नहीं होता। वे बताते है कि अब उनके आसपास के गांव बम्होरी, मोही, गोकुलपुर, अगरा जागीर, बीलखेड़ी सहित 25 गांवों में भी औषधीय खेती होने लगी है।

इनका कहना है

जिले में लगभग 800 एकड़ में 90 से अधिक गांवों के किसान औषधीय खेती करने लगे हैं। इसमें अश्वगंधा का रकबा 300 एकड़ है। पाली गांव में सबसे अधिक अश्वगंधा की खेती होती है। अगले साल औषधीय खेती का रकबा 1200 एकड़ करने का लक्ष्य रखा गया है।

- केएल व्यास, सहायक संचालक, उद्यानिकी विभाग, विदिशा।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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