नवोदित सक्‍तावत, इंदौर। मध्यप्रदेश के भोपाल से सटे जिला विदिशा में ऐतिहासिक रामलीला 119 साल से लगातार संचालित की जा रही है। इस मेले में रामलीला का संचालन और मंचन की जिम्मेदारी शहर की 100 परिवारों की पीढ़ियां संभालते आ रही हैं। आज इन परिवारों के लोग जहां कहीं भी होते हैं इस एक महीने के लिए विदिशा आ जाते हैं। कई लोग दूसरे प्रदेश और देश में डॉक्टर, इंजीनियर और कई अन्य बड़े सरकारी पदों से तक छुट्टी लेकर आते हैं। 14 जनवरी से शुरू होकर 9 फरवरी तक लीला का मंचन किया जाता है। इस बार भी लीला का मंचन शुरू हो चुका है। रविवार को ताड़का और सुबाहु वध की लीला का मंचन हुआ।

लीला दर्शन समिति के मंत्री राजदीप शर्मा ने बताया कि बनारस की तरह ही इस रामलीला का संचालन होता है। मेला समिति के नाम से 19 एकड़ से अधिक जमीन है, इसी जमीन के एक हिस्से में बना है रामलीला भवन और मैदान, वहीं दूसरे हिस्से में मेले की पक्की दुकानें और आरक्षित खाली प्लाट हैं।

इस समिति के पदेन अध्यक्ष कलेक्टर हैं। वहीं सचिव की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। बकायदा इस समिति का शुरूआत से ही बायलॉज है। 1901 में मेला की नींव रखने वाले प्रधान संचालक धर्माधिकारी स्व विश्वनाथ शास्त्री थे। वर्तमान में प्रधान संचालक पं. चंद्रशेखर मिश्र हैं।

तंबू में बनती थी अयोध्‍या

शुरूआत में खाली खेत में लीला और तंबू में अयोध्या बनती थी। लेकिन आज अयोध्या का तीन मंजिला भवन, लंका का दो मंजिला भवन, चार बड़े प्रवेश द्वार, दुकानें, 10 हजार लोगों के बैठने के लिए स्टेडियम, श्री राम जानकी मंदिर सहित कई निर्माण कराए गए। इतने वर्षों बाद भी रामलीला के मंचन में किसी प्रकार का संवाद या लीला का बदलाव नहीं हुआ। पुराने लिखित संवादों पर ही मंचन होता है।

लीला दर्शन समिति के सह प्रधान संचालक डॉ. सुधांशु मिश्र ने बताया कि मेले का सालाना बजट सवा करोड़ के करीब होता है। सिर्फ लीला मंचन की व्यवस्थाओं में ही एक महीने में 25 लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। मेले में 30 साल पहले तक नौटंकी भी आती थी, वहीं 13 साल पहले तक सरकारी विभागों की विज्ञान प्रदर्शनी लगती थीं।

रामलीला में ड्रेस और श्रृंगार करने वाले कलाकार भी

श्रृंगार करने वाले कलाकार विशाल चतुर्वेदी ने बताया कि हर साल एक ही विधी से ही लीला पात्रों का श्रृंगार किया जाता है। यह सिलसिला उनके दादाजी के समय से जारी है। श्रृंगार के दौरान बहुत ही साधारण और पुराने तरीके से मृदाशंख, रोली, मृगान, भोडल और कोयले का उपयोग किया जाता है। वहीं ड्रेस भी पात्रों के लिए पहले से ही तय होती है। यहां पर यह सेवाएं बिल्कुल निशुल्क दी जाती हैं। इसलिए आधुनिकता के दौर में भी यहां लीला देखने के लिए आस्था का सैलाब उमड़ता है।

Posted By: Navodit Saktawat

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