विदिशा। ऊंचाई 2.8 फिट और अनगिनत बार टूट चुकी शरीर की हडि्डयां, जिसके चलते खड़े भी नहीं हो पाने की मजबूरी लेकिन हिम्मत इतनी कि दूसरों को जीने का हौसला देती हैं। यह संघर्ष की दास्तान है, देश की 100 पॉवरफुल महिलाओं में शामिल 33 वर्षीय दिव्यांग पूनम श्रोती की। जो आज न केवल दिव्यांगों के लिए आशा का केंद्र है बल्कि युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत है। उनकी जिंदगी का फलसफा है कि जब मैं सबकुछ कर सकती हूं तो आप क्यों नहीं।

एसएटीआई कालेज में शनिवार को बीई के प्रथम वर्ष के छात्रों के बीच मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में अपनी बात कहने आईं पूनम ने नवदुनिया से अपना संघर्ष भी साझा किया। दोस्त की गोदी में बैठकर मंच तक पहुंची पूनम का युवा छात्रों से कहना था कि विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच के जरिए अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। पूनम ने नवदुनिया को बताया कि बचपन में ही उन्हें हडि्डयों की एक विशेष बीमारी हो गई थी। जो देश में लाखों में एक व्यक्ति को होती है।

इस बीमारी में हल्का दबाव पड़ने पर भी शरीर की हडि्डयां चटक जाती हैं। अब तक न जाने कितनी बार शरीर की विभिन्न् हडि्डयां टूटी। इस बीमारी के चलते हाइट थमकर रह गई। लेकिन उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी। हायर सेकेंड्री तक की पढ़ाई नियमित स्कूल जाकर की। इसके बाद दो अलग-अलग विषयों में एमबीए किया।

एक निजी कंपनी में 6 साल तक नौकरी की। पिछले 3 साल से दिव्यांगों की सहायता के लिए उद्दीप नामक एक स्वयंसेवी संस्था बनाई। जिसके जरिए शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को शिक्षा और आजीविका के क्षेत्र में काम कर रही है। पूनम ने कहा कि विदिशा के एसएटीआई कालेज में आकर उन्हें काफी अच्छा लगा। उन्होंने कॉलेज के डॉयरेक्टर डॉ. जेएस चौहान की भी सराहना की।

आसान नहीं था इस मुकाम को पाना

देश की 100 पावरफुल महिलाओं में शामिल होने और 4 साल पहले राष्ट्रपति के द्वारा पुरस्कृत होने वाली पूनम का कहना था कि यह मुकाम हासिल करना बिल्कुल आसान नहीं था। बचपन में साथियों का मजाक सहना पड़ा। उच्च शिक्षा लेने के बाद जब नौकरी की बारी आई तो सारी योग्यता होने के बावजूद शारीरिक अक्षमता के चलते बार-बार खारिज किया जाना किसी भी व्यक्ति के लिए टूटने के लिए पर्याप्त था। लेकिन अपनी कमजोरी को ही खासियत बना लेने के दृष्टिकोण ने इन विपरीत परिस्थितियों से निपटने में सहायता की।

एक माह तक रखा था उल्टा टांग कर

पूनम बताती हैं कि उनका जन्म वर्ष 1986 में टीकमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। जन्म के समय उनके पिता राजेन्द्र श्रोती कारगिल में सेना में तैनात थे। जन्म के समय ही वह लगातार दो दिन रोती रही। इसके बाद जब पिता घर आए तो वे टीकमगढ़ के अस्पताल में ले गए। जहां डाक्टर ने पैर कमजोर होने की बात कहते हुए दोनों पैर उल्टे टांग कर एक माह तक रखा। जब सुधार नहीं हुआ तो पिता भोपाल के अस्पताल लेकर आए। जहां बीमारी के बारे में पता चला। लाइलाज बीमारी होने पर माता पिता ने भी इसे भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। आज भी वे मानसिक रूप से काफी सपोर्ट करते हैं।

Posted By: Prashant Pandey

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