शुभ या अशुभ कर्म का फल मिलना निश्चित है, फल किसी भी स्थिति में नहीं कटताः आचार्य कुलश्रेष्ठ

- मेहलुआ चौराहे पर वेद मंदिर में चल रहा महायज्ञ, विदिशा चल रही श्रीराम कथा

फोटो 15 कुरवाई। मेहलुआ चौराहे पर चल रहा चर्तुवेद शतकम गायत्री महायज्ञ।

कुरवाई। संसार में मनुष्य को उसके किए गए हुए शुभ अथवा अशुभ कर्म को अवश्य ही भोगना पड़ता है, कर्म फल किसी भी स्थिति में कटता नहीं है, पुण्य कर्म का फल अलग मिलता है, पाप कर्म का फल अलग मिलता है। ईश्वर भक्ति, साधना का फल अलग मिलता है। कर्ता अपने कर्म को चाहे भले भुलाए। एक दिन ऐसा आता है कर्म फलित हो जाए। यह विचार यहां वेद मंदिर आर्य समाज मेहलुआ चौराहे पर चल रहे चर्तुवेद शतकम गायत्री महायज्ञ के पुण्य आयोजन में द्वितीए दिवस के प्रवचन कार्यक्रम में आगरा से पधारे हुए आचार्य उमेश कुलश्रेष्ठ ने व्यक्त किए।

आयोजन में भजनोपदेशक भूपेन्द्र शास्त्री, पं.लेखराजशर्मा के प्रेरणादायी भजन जनमानस को बांधे रहे थे। इस मौके पर मुनिजन राममुनि वानप्रस्थी कुरवाई, आर्यमुनि वानप्रस्थी बैरसिया, शिवमुनि वानप्रस्थी सिरोंज पगरानी, राममुनि वानप्रस्थी आगरा ने भी वैदिक सत्संग्ग में विचार व्यक्त किए। द्वितीए दिवस यर्जुवेद, व सामवेद के मंत्रों का पाठ सुश्री ऋतम्भरा सोनी के मुखारविन्द से हुआ। आयोजन में बेटी बचाओ का प्रदर्शन सोम्या सोनी, आस्था सोनी, व प्राची सोनी के द्वारा किया गया। महायज्ञ की पूर्णआहूति बुधवार को होगी, इस मौके पर क्षेत्र में धार्मिक पूजा पाठ, हवन यज्ञ में संलग्न रहे ब्राह्मण बन्धुओं एवं वैदिक विद्वानों का सम्मान आर्य समाज मेहलुआ चैराहा के द्वारा किया जाएगा।

श्रीराम ने तोड़ा शिव धनुष, राम बारात में झूमे श्रद्घालु

फोटो 18 विदिशा। कथा में सीमा स्वयंवर के अवसर पर मौजूद श्रद्घालु।

विदिशा। पूरनपूरा गली नं. 4 में चल रही श्रीराम कथा में छठवें दिन मंगलवार को बाल संत कुमारी प्रियंका भारती ने सीता स्वयंवर, धनुषयज्ञ, श्रीराम सीता के विवाह के शुभ व मधुर प्रसंग का सुंदर वर्णन किया।

धनुष यज्ञ की कथा में में अनेक राजाओं योद्घाओं के मद का मर्दन हुआ। जिन राजाओं को अपने बल पर अभिमान था वे शिव जी के धनुष को अपने स्थान से डिगा भी न सके। रावण का अभिमान टूटने पर उनके क्रोध का चित्रण श्रोताओं को आनन्द से परिपूर्ण कर गया। अयोध्या नरेश राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र भगवान श्रीराम चन्द्र सरकार ने धनुष को सहज ही भंग कर दिया। इस अवसर पर श्रीराम बारात का भव्य सुन्दर व मनोरम आयोजन किया गया। राम जी की बारात मे श्रद्घालुगण नाचते, गाते, झूमते हुए ढोल नगाड़ों के साथ हर्षित भाव से चल रहे थे। साथ ही भव्य आतिषबाजी भी हो रही थी। कथा में श्री परशुराम जी के संवाद का वर्णन हुआ। जब श्री परषुराम जी को धनुष भंग होने की सूचना प्राप्त हुई तब वे अति क्रोधित होकर जनक जी के महल में आ पहुंचे। जहां लक्ष्मण जी से उनका क्रोधपूर्ण संवाद हुआ। परंतु श्रीराम जी ने उनके आग्रह पर बाण संधान कर भगवान श्री परशुराम जी का संदेह दूर किया।

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