विदिशा (नवदुनिया प्रतिनिधि)। कोरोना महामारी के दौरान सैकड़ों लोग इसके शिकार हुए। किसी का पत्नी से साथ छूटा तो किसी का सुहाग उजड़ गया। महामारी की रफ्तार कम होने के साथ ही इन परिवारों के दिल के जख्म भी धीरे-धीरे भरने लगे हैं। अब आगे के जीवन की शुरूआत के लिए वे कदम आगे बढ़ाने लगे हैं। इसके लिए जैन सोशल ग्रुप का पुनर्विवाह ग्रुप एक माध्यम बना है। जिसके जरिए अपनों से बिछड़े हुए लोग फिर अपने नए जीवन की शुरूआत कर सकेंगे। इसके लिए अब तक 155 बायोडाटा आ गए हैं। जिसमें 117 पुरूष और 38 महिलाओं ने नए साथी की तलाश कर जीवन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब यह लोग इंटरनेट मीडिया के जरिए एक दूसरे को समझेंगे और रिश्तों की डोर में बंध सकेंगे।

जैन सोशल ग्रुप विदिशा के संस्थापक अध्यक्ष राकेश जैन ने कोरोना में अपनी पत्नी सविता जैन को खोने के बाद वैश्व पुनर्विवाह ग्रुप का गठन किया था। जिसमें जैन के अलावा अग्रवाल, माहेश्वरी और गुप्ता समाज के लोगों को शामिल किया गया है। जैन ने बताया कि अब तक उन्हें मध्यप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात सहित अन्य राज्यों के विभिन्ना्‌ शहरों से बायोडाटा प्राप्त हुए हैं। जिसे वे व्हाट्सएप ग्रुप पर जोड़ रहे हैं। उनका कहना था कि बायोडाटा के आधार पर ग्रुप में शामिल सदस्य एक दूसरे से बातचीत कर अपना जीवनसाथी तलाश कर सकेंगे। इस पुनर्विवाह की प्रक्रिया में जैन सोशल ग्रुप एक माध्यम बना हुआ है। ग्रुप के जरिए इच्छुक लोग एक दूसरे को समझकर नई जिंदगी की शुरूआत कर सकेंगे। इसके लिए वे इच्छुक लोगों को कोर्ट मैरिज की सलाह दे रहे हैं।

पुनर्विवाह ग्रुप का वर्चुअल शुभारंभ

जैन सोशल ग्रुप विदिशा द्वारा ग्रुप की उपाध्यक्ष सविता जैन की स्मृति में वैश्य समाज का पुर्नविवाह ग्रुप का वर्चुअल शुभारंभ किया गया। इस दौरान वरिष्ठ समाजसेवी और निजी अस्पताल के संचालक डॉ. जय प्रकाश पालीवाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे समाज में युग युगांतर से जन्म जन्मांतर से विधवाओं और पीड़ित मानवता में खासकर महिलाओं के मामले सामने आए हैं। राजाराम मोहन रॉय ने सती प्रथा का विरोध करते हुए विधवा विवाह का बीढ़ा उठाया था जो इतिहास के पन्नो में दर्ज है। उन्होंने बताया कि कोरोना काल के दौरान मैंने कई परिवारों को बिखरते देखा किसी की पत्नी ने तो किसी के पति ने दम तोड़ा। मेरे मित्र राकेश जैन की पत्नी सविता जैन ने इसी दौरान अंतिम सांस ली। राकेश को मैं बहुत समय से जानता हूँ उनमें समाज सेवा व समाज सुधार का एक साहसिक जज्बा है। डॉ. पालीवाल ने कहा कि समाज में किसी भी उम्र के बच्चों के लालन पालन में मां की छाया व पिता का साया से बड़ी कोई आवश्यकता नहीं है। आज आवश्यकता है असमय हुए विधवा विधुर की परिस्थितियों को समझते हुए उन्हें जोड़ने की पहल की। यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी भी है। वैश्य पुर्नविवाह समिति ने एक मंच दिया है। बिखरे परिवार को जोड़ना एक बहुत बड़ा धर्म है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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