अजय जैन, विदिशा। नगर पालिका चुनाव में पार्षद बनने के लिए प्रत्याशियों ने पूरे संसाधन झोंक दिए हैं। शासकीय तौर पर एक पार्षद को हर माह सिर्फ 1800 रुपये का मानदेय और बैठक भत्ते के रूप में 195 रुपये मिलते है। इसके बावजूद प्रत्याशी चुनाव में लाखों खर्च कर रहे हैं। सभी वार्ड विकास और जनसेवा का राग अलाप रहे हैं,लेकिन चुनाव अब प्रतिष्ठा का सवाल बन गया हैं। विदिशा नगर पालिका के 39 वार्डों में पार्षद पद के लिए 143 प्रत्याशी मैदान में हैं। इस लिहाज से हर वार्ड से औसतन चार प्रत्याशी मैदान में हैं। जैसे-जैसे मतदान की तारीख छह जुलाई नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे चुनाव प्रचार भी तेज हो गया हैं। हर वार्ड में प्रत्याशियों के कार्यालय खुल गए हैं। वाहनों का रेला प्रचार करने में जुटा हुआ हैं। प्रत्याशी भी अपनी जीत के लिए दिन-रात प्रचार में लग गए हैं। इनमें भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के अलावा कुछ वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी भी पूरी दमदारी से चुनाव लड़ रहे हैं।

पार्षद को 1800 और अध्यक्ष को मिलते हैं 3600 रुपये

पार्षद को न तो शासन से मानदेय के रूप में कोई बड़ी राशि मिलती है और ना ही उनके पास कोई बहुत बड़े अधिकार होते है। इसके बावजूद कार्यकर्ता टिकट से लेकर चुनाव लड़ने तक के लिए जी जान लगा देता हैं। नपा से मिली जानकारी के अनुसार पार्षद को मानदेय के रूप में प्रति माह सिर्फ 1800 रुपये मिलते हैं।इसके अलावा बैठक भत्ते के रूप में 195 रुपये प्रति बैठक राशि दी जाती हैं। नपा में दो माह में एक बार बैठक का नियम हैं। इसमें यह भी नियम हैं कि एक पार्षद को बैठक भत्ता के रूप में एक माह में 300 रुपये से अधिक का भुगतान नहीं किया जाएगा।नपा उपाध्यक्ष के लिए 2400 रुपये और अध्यक्ष के लिए प्रतिमाह 3600 रुपये मानदेय का प्रविधान हैं।

ये हैं पार्षद पद के चुनाव के खर्चीले होने की वजह

जानकारों का कहना हैं कि जब नपा अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होता है तो अध्यक्ष पद के प्रत्याशी का प्रचार ही जोरशोर से होता था। पार्षद अपने स्तर पर वार्ड में प्रचार करते थे लेकिन इस बार अध्यक्ष पद का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होना हैं। पार्षद में से ही कोई एक को अध्यक्ष चुना जाना हैं, इसलिए अध्यक्ष पद के दावेदार भी पार्षद बनने के लिए चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा जो अध्यक्ष पद का दावेदार नहीं हैं, उन्हें भी चुनाव के बाद पार्षद की अहमियत का पता हैं। किसी अध्यक्ष पद के दावेदार को समर्थन देने से क्या लाभ होगा, यह भी उन्हें पता हैं, इसी वजह से इस बार सभी 39 वार्डों में कोई भी प्रत्याशी जीत में कोई कोर कसर नहीं रखना चाहते। इसलिए वे पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने पार्षद पद के लिए चुनाव प्रचार की खर्च सीमा डेढ़ लाख रुपये तय की हैं, लेकिन इसका पालन करने वाले प्रत्याशियों की संख्या बहुत कम हैं।

पैसे वालों के लिए प्रतिष्ठा से जुड़ा होता हैं यह चुनाव

47 साल पहले नपा में पार्षद रहे जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष बाबूलाल ताम्रकार कहते हैं कि उनके समय में पार्षद का चुनाव बहुत साधारण तरीके से लडा जाता था। तब कोई इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता था। आज के दौर में चुनाव विकृत स्थिति में पहुंच गया हैं। अब अधिकांश पैसे वाले यह चुनाव अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए लड़ते हैं। मानदेय भले ही कम मिले लेकिन अतिरिक्त आय की उम्मीद भी रहती हैं। इसलिए वर्तमान का चुनाव खर्चीला हो गया हैं। वे बताते हैं कि पुराने दौर में लोग पार्षद का चुनाव लडना नहीं चाहते थे। उन्हें मनाना पड़ता था।आज की स्थिति यह हैं कि हर कोई चुनाव लडना चाहता हैं। अब जनसेवा सिर्फ नारा बनकर रह गया हैं।

यह हैं पार्षद के अधिकार

- अपने वार्ड में निर्माण कार्यों की मंजूरी के लिए अनुशंसा करना।

- निर्माण कार्यों और सफाई व्यवस्थाओं की निगरानी करना

- नपा की बैठकों में प्रस्तुत प्रस्तावों पर अपनी सहमति - असहमति व्यक्त करना।

- जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवश्यक दस्तावेजों को प्रमाणित करना।

Posted By: Nai Dunia News Network

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close