हरीश शर्मा, ओंकारेश्वर। इंटरनेट पर नर्मदा परिक्रमा के बारे में पढ़ा था। इसके बाद नर्मदा परिक्रमा के बगैर जीवन अधूरा लगने लगा। एक दिन अचानक दो जोड़ी कपड़े और कुछ जरूरी सामान एक बैग में रखकर मुंबई से आने के लिए ट्रेन पकड़ी। यहां पहुंचकर मां नर्मदा का पूजन कर यात्रा शुरू दी। नर्मदा परिक्रमा पैदल और अकेले ही करने की जिद थी। पता था कि माता-पिता इसके लिए राजी नहीं होंगे इसलिए ओंकारेश्वर से परिक्रमा शुरू करने के बाद परिवार वालों को इसके बारे में बताया।

जुनून के चलते 80 दिनों में मुंबई निवासी शिप्रा पाठक (37) ने 3300 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा पूरी कर ली। नर्मदा जयंती पर परिक्रमा की समाप्ति पर ओंकार पर्वत की परिक्रमा कर भगवान ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग को जल अर्पित करने के बाद वह महाकाल के दर्शनार्थ उज्जैन रवाना हो गई।

राजघाट, भरूच, डिंडोरी और अमरकंटक से गुजरने के दौरान राह में कई अच्छे और बुरे अनुभवों का सामना करने वाली शिप्रा ने नईदुनिया से चर्चा में बताया कि नर्मदा परिक्रमा की प्रेरणा उन्हें इंटरनेट पर मां नर्मदा का वृतांत पढ़कर मिली। नेट पर ही नर्मदा परिक्रमा के बारे में जानकारी निकालकर अकेले ही पैदल यात्रा करने की ठान कर ओंकारेश्वर से नवंबर 18 में परिक्रमा शुरू की। मुंबई जैसे महानगर में रहने वाली शिप्रा ने बताया कि नर्मदा किनारे अनेकों मठ-मंदिर, धर्मशाला व आश्रमों में अकेले होने के कारण रात्रि विश्राम के लिए रुकने की अनुमति नहीं दी जाती थी। तब उन्होंने कई बार लोगों को समझाया। कई बार मेरे परिवार के लोगों व परिचितों से बात करवाने पर ठहरने के लिए कमरा मिल सका।

मुझे मां नर्मदा के हवाले छोड़ दो

नर्मदा परिक्रमा के दौरान अमरकंटक पहुंचने पर मुंबई से पिता डॉ. शैलेश पाठक और माता मृदुला पाठक भी वहां आए थे। मां अपने साथ मेरे लिए कई चीजें लाई थीं। मैंने सब यह कहकर लौटा दी कि यदि मां तुम्हारे दिए सामान को मैंने लिया तो मां नर्मदा मेरी चिंता नहीं करेगी इसलिए मुझे मां नर्मदा के हवाले ही छोड़ दो। शिप्रा ने बताया कि नर्मदा परिक्रमा पूरी करने के बाद माता-पिता की नाराजगी दूर करना पड़ेगी। मैंने उनसे कहा है कि इवेंट के सिलसिले में आप मुझे विदेश जाने देते हैं। विदेश में तो अनजान लोगों के साथ रहना पड़ता है। मैं तो हिंदुस्तान में मां नर्मदा की परिक्रमा करने निकली हूं। यहां सब अपने हैं। आप चिंता नहीं करें।

अकेली लड़की विदेश जा सकती है तो नर्मदा परिक्रमा क्यों नहीं कर सकती

शिप्रा मूलतः उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के दातागंज की रहने वाली है। वह बीते कुछ वर्षों से मुंबई में खुद की इवेंट एजेंसी संचालित कर रही है। परिक्रमा के अनुभव नईदुनिया से सांझा करते हुए शिप्रा ने बताया कि कुछ आश्रम में अकेले होने के कारण उन्हें कमरा देने से मना कर दिया गया जाता था। अकेली लड़की को परिक्रमा करने कैसे भेज देते हैं, इस प्रकार के जब सवाल मुझे करते थे तो बड़ा दुख होता था। आज भी इस प्रकार की सोच लोगों के मन में है। कई स्थानों पर तो परिवार वालों से बात करवाने के बाद आश्रम में रुकने की अनुमति मिलती थी। कभी कमरा देने से मना कर कहा जाता था कि क्या तुम घर से भाग कर आई हो। परिवार अकेली लड़की को परिक्रमा करने के लिए कैसे छोड़ देते हैं। मैंने नर्मदा परिक्रमा दौरान के जहां-जहां भी रात्रि विश्राम किया वहां पर लोगों की सोच को बदली और कहा कि अकेली लड़की जब विदेश जा सकती है तो नर्मदा परिक्रमा क्यों नहीं कर सकती है। उसके बाद मुझे मठ, मंदिर या आश्रमों में रुकने की अनुमति मिल जाती थी। मैंने लोगों को यह भी समझाया कि मेरे तरह कभी भी कोई युवती परिक्रमा करने आए तो उसे शंका से देखकर सवालों से उलझाएं नहीं। रात्रि रुकने के लिए उसकी व्यवस्था जरूर करें।

अंजान लोग भी लुटाते हैं ममता

परिक्रमावासी शिप्रा ने बताया कि परिक्रमा करते समय अंजान लोग आपको जानते नहीं हैं लेकिन वह भी आप पर ममता लुटाने लगते हैं। प्रेम करने लग जाते हैं, अपने हाथों से बनाकर भोजन करवाते हैं। लड़की में मां नर्मदा का स्वरूप देखकर पैरों को धोकर नर्मदा परिक्रमावासी की पूजा करते हैं।

अगला पड़ाव व भोजन का नहीं रहता पता

शिप्रा ने बताया कि सुबह उठ कर चलती हूं तो यह पता नहीं रहता रात्रि पड़ाव कहां पर होगा। कब भोजन और कहां पर नाश्ता मिलेगा लेकिन सारी व्यवस्था नर्मदा परिक्रमा के दौरान मां नर्मदा अपने आप ही करवा देती हैं। परिक्रमा की शुरूआत में सोचती थी जल्दी से इसे पूरा करूंगी। कई बार तो इसलिए भी कम चलती हूं ताकि परिक्रमा के लिए ज्यादा दिन मिल जाए और मुझे मां नर्मदा से दूर नहीं होना पड़े।

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