अब इस गलत धारणा का कोई अर्थ नहीं बचा है कि बारिश के दिनों में आंखों की सर्जरी नहीं कराना चाहिए। अब आई सर्जरी की तकनीक इतनी तरक्की कर चुकी है कि आंखों की सर्जरी पर मौसम की मार कोई असर नहीं होता है। आइए जानते हैं कैसे:

बढ़ती उम्र में आंखों की कई बीमारियां होती हैं। इसमें मोतियाबिंद की समस्या सबसे आम है। मोतियाबिंद को लेकर काफी सारी भ्रांतियां हैं, लोगों का मानना है कि इसका ऑपरेशन बड़ा ही दुखदायी है। जरा सा संक्रमण लगने से आंख हमेशा के लिए खराब हो जाती है। कई लोगों की मान्यता है कि मोतियाबिंद पक जाए तभी इसकी सर्जरी कराना चाहिए। ये सब गलत भ्रातियां हैं। मोतियाबिंद की सर्जरी किसी भी मौसम में कराई जा सकती है क्योंकि अब खराब हो चुका प्राकृतिक लैंस बहुत छोटे से छेद से निकाला जाता है और नया कृत्रिम लैंस उसी सुई में से डाल दिया जाता है। जख्म का आकार 1 या 2 मिलीमीटर जितना छोटा होता है। यही वजह है कि अब यह सर्जरी डे केअर में की जाती है और मरीज एक ही हफ्ते में काम पर लौट सकता है।

मोतियाबिंद क्या है?

मानवीय लेंस पारदर्शी होता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ आंखों का यह लेंस धुंधला और अपारदर्शी हो जाता है जिससे सामान्य दृष्टि प्रभावित होती है। इसे मोतियाबिंद या सफेद मोतिया कहा जाता है। इसका आखिरी और एकमात्र इलाज सर्जरी ही होता है।

क्या हैं लक्षण?

1. धुंधला दिखाई देना।

2. रंग का फीका दिखना या रंग साफ दिखाई न देना।

3. तेज रोशनी या सूरज की रोशनी के प्रति आंखों का सेंसिटिव होना।

4. रात में कम दिखाई देना।

5. रात में आंखों में अधिक परेशानी होना।

कैसे की जाती है मोतियाबिंद की सर्जरी?

फेको मोतियाबिंद सर्जरी की नवीनतम तकनीक है जो आज कल इस्तेमाल में है। इस तकनीक की वजह से मोतियाबिंद सर्जरी में बस कुछ घंटों के बाद मरीज अपने घर लौट जाता है। फैको में अल्ट्रासाउंड ऊर्जा का इस्तेमाल सख्त हो चुके सफेद मोतिया को टुकड़ों में विभक्त करने के लिए किया जाता है। आंख में एक छोटा सा लगभग 1 मिलीमीटर का चीरा लगाकर बाहर निकाल लिया जाता है। फिर जरुरत के मुताबिक पावर वाला एक फोल्डेबल लेंस (आईओएल) निकाले गये स्वाभाविक लेंस की जगह स्थापित कर दिया जाता है।

अधिक समय नहीं लगता

ऑपरेशन के दौरान समय नहीं लगता है, लेकिन दोनों आंखों के आपरेशन सर्जरी के बीच आम तौर पर दो महीने का अंतर होना चाहिए पर मरीज की सुविधा के अनुसार तीन से पांच दिनों के अंतर पर भी यह सर्जरी कर दी जाती है। कई बार कैटरेक्ट की वजह उम्र बढ़ने के साथ किसी प्रकार का कोई ट्रॉमा या फिर मेटाबोलिक डिसओर्डर जैसे डायबिटीज, हाइपोथायरॉयड या आंखों में सूजन होना भी हो सकता है।

उपचार की तकनीक

कैटरेक्ट सर्जरी के दौरान आंखों के प्राकृतिक लेंस निकाल लिए जाते हैं और इनकी जगह आंखों में कृत्रिम लेंस प्रत्योरापित कर दिए जाते हैं। यह कृत्रिम लेंस ही इंट्राओक्यूलर लेंस (आईओएल) कहा जाता है। आईओएल रेटिना पर रोशनी की किरणें केंद्रित करने में मदद करता है जिससे एक प्रतिमा बनती है तथा हम इसे देखने में सक्षम होते हैं। अब कैटरेक्ट के उपचार से संबंधित कई नई तकनीकें बाजार में उपलब्ध हैं। यदि रोगी की सर्जरी 'मल्टीफोकल आईओएल ' के साथ की गई हो तब सर्जरी के बाद चश्मा पहनने की जरुरत नहीं पड़ती है। वहीं दूसरी ओर यदि सर्जरी के बाद मोनोफोकल आईओएल लगाया गया तब चश्मे का प्रयोग जरूरी हो जाता है।

सर्जरी के बाद क्या बरतें सावधानियां

- दवा का उपयोग चार से छह सप्ताह तक करें।

- शुगर व बीपी को भी नियंत्रित रखें

- सिर धोते समय विशेष सावधानी बरतें

- डॉक्टर से जरूरी जानकारी ले लें।

- अगर आप घर से बाहर जा रहे हैं तो आंखों पर डार्क कलर के ग्लासेज पहनना ना भूल

- डॉ. प्रतीप व्यास, नेत्र रोग विशेषज्ञ, इंदौर