डॉ रुपाली मित्तल। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक का उपयोग अब भी खतरे की सीमा तक ही हो रहा है। यह प्राणियों के जीवन से लेकर पर्यावरण तक के लिए गंभीर समस्या है। प्लास्टिक से ही उपजने वाली एक और समस्या है माइक्रोप्लास्टिक की, जो कि प्लास्टिक का ही एक रूप है।

असल में प्लास्टिक के साथ जुड़ी सबसे नकारात्मक बात यह है कि यह प्राकृतिक तरीके से सड़कर इसका नष्ट नहीं हो पाती है। समय के साथ धीरे-धीरे प्लास्टिक टूटकर बहुत छोटे टुकड़ों में बंट जाता है। यही माइक्रोप्लास्टिक्स कहलाते हैं जो पर्यावरण के साथ साथ इंसान के जीवन के लिए भी खतरा बन सकते हैं। ये टुकड़े 0.2 इंच से भी कम के हो सकते हैं। कांच या स्टील बेहतर विकल्प भोजन गर्म करने, पकाने, बाजार से खाद्य सामग्री लाने, पानी रखने आदि के लिए हम बिना विचारे प्लास्टिक का उपयोग करते हैं। लम्बे समय तक किया जाने वाला यह उपयोग कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

माइक्रोवेव में प्लास्टिक के कंटेनर्स में भोजन गर्म करना, प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर फ्रिज में रखना, बाजार से प्लास्टिक में खाना लेकर आना, इन सब चीजों का उपयोग कम से कम करने की कोशिशकरें। माइक्रोवेव के लिए कांच के बर्तनों का प्रयोग करें। ज्यादा से ज्यादा गैस स्टोव पर स्टील के बर्तनों का उपयोग करें।

-प्लास्टिक को लचीला बनाने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले रसायन फैलेट को एक शोध में स्तन कैंसर की कोशिकाओं की वृद्घि में बढ़ोतरी का कारण माना गया।

-चूहों के ऊपर हुए एक शोध में प्लास्टिक के इन कणों को लिवर, किडनी और आंतों के साथ ही दिमाग को नुकसान पहुंचाने वाला पाया गया।

-शोध यह भी स्पष्ट करते हैं कि ये छोटे कण आंतों से गुजरते हुए रक् में पहुंच जाते हैं और सभी अंगों को मुश्किल में डाल देते हैं।

-कुछ शोध इन प्लास्टिक कणों की उपस्थिति को मनुष्य के फेफड़ों में दर्शा चुके हैं। जहां इनकी वजह से काफी नुकसान पहुंचता है।

-रसायन बिस्फिनॉल ए (बीपीए) प्लास्टिक पैकेजिंग और खाना रखने वाले डिब्बों में पाया जाता है। शोध दर्शाते हैं कि यह रसायन मुख्यतौर पर महिलाओं में प्रजनन संबंधी हार्मोन्स का असंतुलन पैदा कर सकता है।

भोजन में उपस्थिति

हाल ही में हुए कुछ शोध इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति हमारे भोजन में भी दिखाई देने लगी है। इन माइक्रोप्लास्टिक का पानी और मिट्‌टी में पाया जाना आम है और यहीं से ये जानवरों के पेट तक या हमारे भोजन तक पहुंचते हैं।

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