आगरा। बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू के बाद जानवरों से मनुष्यों में पैरा टीबी फैल रही है। इंसानों में पैरा टीबी का बैक्टीरिया (माइक्रोबैक्टीरियम एवीयम पैरा ट्यूबरक्लोसिस) आंत में संक्रमण के बाद धीरे-धीरे शरीर को खोखला कर रहा है। अब यह जानलेवा होने लगा है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा तीन साल तक कराई गई पड़ताल इसी साल जून में पूरी हुई है। इसमें कच्चा दूध, दूध के उत्पाद, आइसक्रीम, पशुओं के मल और मांस से पैरा टीबी फैलने के चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

आईसीएमआर ने जून 2015 में उत्तर प्रदेश के आगरा में जालमा कुष्ठ एवं अन्य माइक्रोबैक्टीरियल रोग संस्थान और मथुरा के केंद्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र को पैरा टीबी फैलने के कारण जानने के लिए रिसर्च प्रोजेक्ट दिया था। यह तीन साल तक चलना था। रिसर्च में पहले साल में ही जानवरों से मनुष्यों में तेजी से पैरा टीबी फैलने के संकेत मिलने लगे। इसके बाद एम्स, दिल्ली को भी रिसर्च में शामिल कर लिया गया।

इसी साल जून में जालमा और बकरी अनुसंधान केंद्र ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। एम्स, दिल्ली में अभी रिसर्च चल रही है। रिसर्च में शामिल जालमा के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. डीएस चौहान ने बताया कि कच्चा दूध, ब्रांडेड कंपनी का पाश्चराइज्ड दूध, पनीर, आइसक्रीम, जानवरों के मल और मांस की कोडिंग करने के बाद मॉल्युकुलर लेवल की जांच पीसीआर 900 द्वारा कराई गई।

रिसर्च में शामिल केंद्रीय बकरी अनुसंधान से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक शूरवीर सिंह ने बताया कि बकरी, भैंस, भेड़, नील गाय डायरिया के बाद कमजोर होने लगीं। कुछ साल बाद मौत हो गई। इनकी जांच में पैरा टीबी का संक्रमण मिला, बीमारी तेजी से फैलने पर पशुओं के दूध की जांच कराई गई। इसमें पैरा टीबी के बैक्टीरिया मिले।

कच्चा दूध पीने से इंसानों में पैरा टीबी फैलने की आशंका पर जांच कराई गई। जानवरों से इंसानों में पैरा टीबी फैलने की पुष्टि के बाद आईसीएमआर द्वारा रिसर्च प्रोजेक्ट दिया गया। रिसर्च में सामने आया है कि बकरी, भैंस की तरह पैरा टीबी का बैक्टीरिया मनुष्यों में पहुंचने के बाद आंत में संक्रमण फैलाता है। इन्फेक्शन फैलने के बाद कोई इलाज नहीं है और मौत हो जाती है।

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