नई दिल्ली। आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि धूम्रपान करने वाले लोग ही फेफड़े के कैंसर से पीड़ित होते हैं। कुछ हद तक यह बात सही भी है पर अब प्रदूषण भी उतना ही नुकसान पहुंचा रहा है। प्रदूषण के कारण लोग फेफड़े के कैंसर से पीड़ित हो रहे हैं।

दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि फेफड़े के कैंसर से पीड़ित मरीजों में हर दूसरा व्यक्ति नॉन स्मोकर (धूमपान नहीं करने वाला) है। इतना ही नहीं, प्रदूषण के कारण कम उम्र में ही लोग इस बीमारी के चपेट में आ रहे हैं।

गंगाराम अस्पताल के सेंटर फॉर चेस्ट सर्जरी के अध्यक्ष व लंग केयर फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. अरविंद कुमार ने कहा कि मार्च 2014 से जून 2018 के बीच इलाज के लिए पहुंचे फेफड़े के कैंसर से पीड़ित 150 मरीजों पर अध्ययन किया गया है। इसमें पाया गया कि 50 फीसद मरीज धूम्रपान करते थे, जबकि 50 फीसद नहीं करते थे। इन मरीजों के परिवार में भी कोई धूम्रपान नहीं करता था, यानी ये मरीज सेकेंड हैंड स्मोकर भी नहीं थे।

अध्ययन में पाया गया कि 21 फीसद मरीजों की उम्र 50 साल से कम थी। इनमें से 3.3 फीसद मरीजों की उम्र 21 से 30 वर्ष के बीच और 5.3 फीसद की उम्र 31 से 40 वर्ष के बीच थी। पहले की तुलना में महिला मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। 33.3 फीसद मरीजों की उम्र 51-60 वर्ष व 30 फीसद मरीजों की उम्र 61-70 वर्ष थी। पुरुष व महिला मरीजों का अनुपात 3.8:1 पाया गया।

डराते हैं यह आंकड़े

डॉ. अरविंद ने कहा कि पहले करीब 90 फीसद लोगों को यह बीमारी धूम्रपान के कारण होती थी। बाद में यह ग्राफ गिरकर 70-80 फीसद पर आया। हमारे अध्ययन में धूमपान करने व नहीं करने वालों का अंतर खत्म होता दिख रहा है। यह आंकड़ा डरावना है। प्रदूषण के कारण लोगों का फेफड़ा काला पड़ता जा रहा है।

जन्म से ही 10 सिगरेट के बराबर प्रदूषित हवा ले रहे

डॉक्टर कहते हैं कि देश में फेफड़े के कैंसर के हर साल 60-70 हजार मामले सामने आते हैं। दिल्ली सहित कई शहरों में प्रदूषण इतना बढ़ गया है सिगरेट पीने या नहीं पीने का अंतर मिट गया है। जन्म के बाद से ही बच्चा 10 सिगरेट के बराबर प्रदूषित हवा सांस के रूप में ले रहा है। इसलिए लोग नहीं चाहते हुए भी धूम्रपान कर कर रहे हैं। धूम्रपान रोकने के साथ ही यदि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए गए तो इसके भयावह नतीजे होंगे।

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