अनंत मिश्र

मद्रास हाईकोर्ट में टिक-टोक एप के खिलाफ याचिका तब दायर हुई जब एक बच्ची ने आत्महत्या कर ली। 15 वर्षीय किशोरी को उसकी दादी ने टिक-टॉक का उपयोग करने के लिए डांटा था तो उसने यह घातक कदम उठाया। बच्ची का आत्महत्या करना दादी की डांट का नतीजा था। दादी ने इसलिए डांटा क्योंकि वह दिनभर मोबाइल पर व्यस्त रहती थी मगर इस बच्ची की असामयिक मृत्यु ने टिक-टॉक की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। पड़ताल शुरू हुई तो सामने आया कि इस एप पर कई ऐसी सामग्री है जो अश्लील और अमर्यादित है। अखबारों में और कई वेबसाइट पर लेख लिखे गए कि टिक-टोक नकेवल अश्लील सामग्री को फैलाने में मदद कर रहा है बल्कि यह युवाओं को भटकाने का काम भी कर रहा है। इसी आधार पर इस वीडियो एप पर थोड़े समय के लिए बैन लगा और फिर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई बेंच ने बैन उठा भी लिया। बैन आरोपित करने और उसे उठाने के बीच इस सोशल मीडिया एप के तमाम पहलुओं पर चर्चा हुई। संभव है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच सकता है लेकिन अभी तक इससे जुड़ी जितनी बातें सामने आई हैं उन पर गौर जरूरी है।

कोर्ट ने इस एप पर जो बैन लगाया था उसका बहुत गंभीर असर इसलिए नहीं रहा क्योंकि जिन यूजर्स ने इस एप को डाउनलोड कर लिया था वे इसका आसानी से उपयोग कर रहे थे और बैन से उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। बेंच ने इसके नए डाउनलोड पर रोक लगाई थी। एप की डेवलपर कंपनी 'बाइटडांस' ने अपने बचाव में कहा कि उसने कभी भी अश्लीलता को बढ़ावा नहीं दिया। बताया जा रहा है कि इस बैन से कंपनी को 5 लाख डॉलर प्रतिदिन का नुकसान हो रहा था और इस कारण 250 नौकरियां खतरे में आ गई। भारत इस वीडियो एप के लिए एक बड़ा बाजार है। सेंसर टॉवर का कहना है कि भारत में 30 करोड़ केकरीब यूजर्स हैं और दुनियाभर में इसके करीब 1 अरब वीडियो डाउनलोड किए गए हैं। टिक-टोक का दावा है कि भारत में उसके 25 करोड़ यूजर्स हर महीने एक्टिव रहते हैं। दिसंबर 2017 से दिसंबर 2018 के बीच टिक-टोक के कुल इंस्टालेशन का 27 फीसदी भारत में हुआ।

इस एप पर बैन लगाने का विचार हालांकि इसलिए आया क्योंकि कई राजनीतिज्ञों और अभिभावकों का मानना था कि टिक-टोक पर जिस तरह की सामग्री है वह अश्लील है और नाबालिगों को गुमराह कर रही है। इसके पहले भी राज्य की कोर्ट ने इस एप पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इस एप का उपयोग करने वाले बच्चे यौन हिंसा करने वालों के हाथों भी पड़ सकते हैं। इसके जवाब में टिक-टॉक ने कोर्ट के समक्ष कहा है कि उसके कुल वीडियोज का बहुत छोटा प्रतिशत इस तरह के वीडियोज का है और भारत के यूजर्स द्वारा बनाए गए कंटेंट की समीक्षा करने के बाद उसने करीब 60 लाख वीडियोज हटाए हैं जो कि कम्युनिटी गाइडलाइंस का उल्लंघन करते थे। हालांकि भारत में इस एप पर लगा बैन किसी देश द्वारा लगाया गया पहला बैन नहीं है। अमेरिका में फेडरल ट्रेड कमीशन ने फरवरी में इस एप पर 57 लाख डॉलर काजुर्माना किया था क्योंकि यह बच्चों की सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन करता था। इसके अलावा कमीशन का यह भी कहना था कि यह एप डाउनलोड करने वाले के लिए उम्र का कोई बंधन भी नहीं लगाता है।

मद्रास हाईकोर्ट की बेंच ने इस पूरे मामले में एक विशेषज्ञ को भी शामिल किया ताकि विषय के पक्ष-विपक्ष स्पष्ट हो सकें। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने फिलहाल बैन स्थगित कर दिया लेकिन उसने कंपनी को चेताया है कि वह बच्चों को अश्लील सामग्री से बचाने की चिंता करे। टिक-टॉक एप की डेवलपर कंपनी का मद्रास हाईकोर्ट की बेंच के बैन हटा लेने पर कहा, 'हम खुश हैं कि इस प्लेटफॉर्म का गलत उपयोग रोकने के लिए हम जो प्रयास कर रहे हैं उसका कोर्ट ने संज्ञान लिया है। हम सुरक्षा फीचर भी बढ़ा रहे हैं ताकि भारत में यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।' हाईकोर्ट ने बैन उठाते हुए मगर इस कंपनी को आगाह किया है कि अगर उसने अश्लील कंटेंट को हटाने की व्यवस्था नहीं की तो अगली बार उसे अदालत की अवमानना का दोषी भी पाया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि भारत में बच्चों को सायबर स्पेस में अश्लीलता से बचाने के लिए कोई कानून नहीं हैऔर सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। अमेरिका में बच्चों को बचाने के लिए चिल्ड्रंस ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट (सीओपीपीए) है।

तमाम बातों के बीच मगर यह भी गौरतलब है कि वीडियो-शेयरिंग एप लगातार आलोचना का कारण बन रहे हैं। इसके पहले 'किकि चैलेंज' वीडियोज खूब बनाए जा रहे थे जिसमें कि लोग चलती हुई कार के साथ चलते थे और अपना वीडियो पोस्ट करते थे। वीडियो बनाने के चक्कर में कई लोग चोटिल भी हुए थे। इसके बाद हाल ही में केरल पुलिस ने पाया कि राज्य में लोग टिक-टॉक के लिए फिल्म का गाना अचानक जोर से गाने लगते हैं जिसका मतलब होता है रुक जाइए, रुक जाइए और इसे सुनकर वाहन अचानक रुक जाते हैं और उनके बीच टक्कर हो जाती है।

सायबर विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी मध्यस्थ एप या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन करना समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। इस एप ने अपनी तरफ से आपत्तिजनक कंटेंट नहीं डाला है बल्कि इस तरह का कंटेंट तो यूजर्स ने पोस्ट किया। फिर भारत का आईटी एक्ट किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डाले जाने वाले सारे कंटेंट की प्री-सेंसरशिप के लिए किसी कंपनीको बाध्य भी नहीं कर सकता है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 2010 से 2018 के बीच करीब 14220 वेबसाइट पर को ब्लॉक किया है जिन पर आपत्तिजनक सामग्री थी लेकिन किसी मध्यस्थ वेबसाइट का यानी ऐसे प्लेटफॉर्म जो लोगों को अपनी बात कहने का मौका दे उसका यह पहला बड़ा मामला है। जानकार कहते हैं कि अगर इस तरह के प्लेटफॉर्म के किसी कंटेंट से अगर यूजर्स को आपत्ति होती है तो उन्हें पहले यह आपत्ति डेवलपर कंपनी के शिकायत विभाग तक पहुंचानी चाहिए। ऐसी ही व्यवस्था फेसबुक के लिए भी है क्योंकि फेसबुक भी एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। किसी भी आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर अगर आप फेसबुक में शिकायत करते हैं तो उस तरह के अकाउंट को कुछ समय के लिए और नियमों का पालन न करने पर हमेशा के लिए बर्खास्त भी कर दिया जाता है।

इस एप पर बैन का विरोध करने वाले लोगों का यह भी तर्क था कि अगर इस एप को बैन कर दिया जाता है तो लोग इसका विकल्प तलाशेंगे और कुछ ही दिनों में एक नया प्लेटफॉर्म खड़ा हो जाएगा। इसके अलावा एक डर यह भी है कि सोशल मीडिया एप को बैन करने की परंपरा चल पड़ी तो इससे अच्छेएप पर भी बैन होने का खतरा मंडराने लगेगा। फिर यूजर्स के किए की सजा एप डेवलपर को क्यों मिलना चाहिए जबकि वह इस तरह का अमर्यादित कंटेंट हटाने को तैयार हो? याद रखा जाना चाहिए कि सोशल मीडिया पर जितनी आजादी होगी उतने ही ज्यादा नए विचार सामने आएंगे। सोशल मीडिया का उद्देश्य यही है कि आम आदमी बिना संकोच और डर के अपनी बात सभी के सामने रख सके, निश्चित ही उसमें अश्लीलता या अमर्यादित सामग्री नहीं होना चाहिए। इस तरह के एप पर बैन की मांग करने वालों को सोशल मीडिया और किसी भी मोबाइल गेम के बीच के फर्क को समझने की जरूरत है। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस एप को बैन करके समस्या को काबू नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह तो केवल एक माध्यम है और यह जिम्मेदारी यूजर्स की है कि वे मर्यादाओं का ध्यान रखें। जिस तरह अमर्यादित कंटेंट से टिक-टॉक जूझ रहा है उसी तरह 'फेक न्यूज' से फेसबुक और वाट्‌सएप भी लड़ रहे हैं। जिस तरह फेसबुक और वाट्‌सएप खुद फेक न्यूज नहीं फैला रहे हैं बल्कि यूजर्स ही यह काम कर रहे हैं तो उसकी जिम्मेदारी इन प्लेटफॉर्म की कैसे मानी जा सकती है। मगर कुछ गैर-जिम्मेदार यूजर्स केकारण सभी यूजर्स को खामियाजा भुगतना पड़ता है। सभी यूजर्स एक ही चश्मे से देखे जाने लगते हैं। ऐसे में प्लेटफॉर्म डेवलपर को समय-समय पर फिल्टर लगाकर इस तरह के कंटेंट को हटाने का काम कर सकते हैं। फेसबुक और वाट्‌सएप आगे बढ़कर इस तरह की अफवाहों पर रोक लगाने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। बच्चों तक अश्लील कंटेंट न पहुंचे यह चिंता बहुत स्वाभाविक और महत्वपूर्ण है लेकिन उसके लिए बच्चों को भी शिक्षित करना असल चुनौती है, किसी एप को बैन करना तो बहुत सरल का रास्ता है जो बहुत ज्यादा कारगर भी नहीं है।

टिक-टॉक बैन के इस प्रकरण से एक बात बहुत स्पष्ट हो गई है कि केंद्र सरकार को आईटी संबंधी नीतियों में स्पष्टता लाने की जरूरत है। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री इस तरह के सोशल प्लेटफॉर्म के लिए नए नियम बना रही है। कहा जा रहा है कि इनमें कंपनियों की भी अधिक जिम्मेदारी तय की जा रही है ताकि वह अमर्यादित कंटेंट की निगरानी करे। खासकर नाबालिगों की पहुंच इस तरह के कंटेंट तक न हो सके उसके लिए कुछ प्रावधान करने की जरूरत है। एक तरीका यह भी हो सकता है कि सोशल मीडियाप्लेटफॉर्म पर जो इस तरह का कंटेंट पोस्ट या अपलोड करता है उस यूजर पर प्रतिबंध का विकल्प हो। निगरानी और फिल्टर के जरिए ही सोशल मीडिया को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकेगा।


बैन संभव नहीं....

'इस तरह के बैन के जरिए हम उस समाज को खोज रहे हैं जो असल में है ही नहीं। जब भी इस तरह का बैन लगाया जाता है तो उसका फायदा उसे ही मिलता है जिस पर बैन लगाया गया है। बैन के बाद उस एप पर ट्रैफिक और ज्यादा बढ़ जाता है।'

- पवन दुग्गल, सायबर क्राइम विशेषज्ञ

Posted By: Navodit Saktawat

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